भावना Poetry (page 24)

जहन्नम

बाक़र मेहदी

क्या कहें क्या हुस्न का आलम रहा

बक़ा बलूच

कहाँ से मंज़र समेट लाए नज़र कहाँ से उधार माँगे

लराज बख़्शी

ज़ेहन और दिल में जो रहती है चुभन खुल जाए

बद्र वास्ती

कब बयाबाँ राह में आया ये समझा ही नहीं

बदीउज़्ज़माँ ख़ावर

घर में चाँदी के कोई सोने के दर रख जाएगा

अज़्म शाकरी

ग़रीब शहर

अज़ीज़ क़ैसी

हज़ार वक़्त के परतव-नज़र में होते हैं

अज़ीज़ हामिद मदनी

हम हैं एहसास के सैलाब-ज़दा साहिल पर

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

अपनी हस्ती का कुछ एहसास तो हो जाए मुझे

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

वो ये कह कह के जलाता था हमेशा मुझ को

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

फूँक देंगे मिरे अंदर के उजाले मुझ को

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

जुनूँ-नवाज़ सफ़र का ख़याल क्यूँ आया

अज़ीज अहमद ख़ाँ शफ़क़

अपनी तस्वीर बनाओगे तो होगा एहसास

अज़हर इनायती

वो तड़प जाए इशारा कोई ऐसा देना

अज़हर इनायती

शहर को आतिश-ए-रंजिश के धुआँ तक देखूँ

अज़हर हाश्मी

आज़ुर्दा निगाहों पे ये मंज़र नहीं उतरा

अज़हर हाश्मी

दोश देते रहे बे-कार ही तुग़्यानी को

अज़हर फ़राग़

सरहद-ए-जिस्म से बाहर कहीं घर लिक्खा था

आज़ाद गुलाटी

सरहद-ए-जिस्म से बाहर कहीं घर लिक्खा था

आज़ाद गुलाटी

आने वाले हादसों के ख़ौफ़ से सहमे हुए

आज़ाद गुलाटी

दिल में कुछ दर्द सिवा है यारो

अय्यूब रूमानी

नाव तूफ़ान में जब ज़ेर-ओ-ज़बर होती है

औलाद अली रिज़वी

जब भी तन्हाई के एहसास से घबराता हूँ

अतीक़ुल्लाह

दिल के नज़दीक तो साया भी नहीं है कोई

अतीक़ुल्लाह

ग़म के बादल दिल-ए-नाशाद पे ऐसे छाए

अतहर राज़

'अतहर' तुम ने इश्क़ किया कुछ तुम भी कहो क्या हाल हुआ

अतहर नफ़ीस

'अतहर' तुम ने इश्क़ किया कुछ तुम भी कहो क्या हाल हुआ

अतहर नफ़ीस

जीवन-भर की आस है तू

अतीक़ुर्रहमान सफ़ी

वक़्त ने लूटे हैं हस्ती के ख़ज़ाने कितने

अतीब एजाज़

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