चलो चलें Poetry (page 15)

क्या ग़रज़ लाख ख़ुदाई में हों दौलत वाले

ज़ौक़

कल गए थे तुम जिसे बीमार-ए-हिज्राँ छोड़ कर

ज़ौक़

गईं यारों से वो अगली मुलाक़ातों की सब रस्में

ज़ौक़

दम न निकला यार की ना-मेहरबानी देख कर

शैख़ अली बख़्श बीमार

देखो फ़िराक़-ए-यार में जाँ खो रहा है वो

शहज़ाद रज़ा लम्स

ज़बाँ का ज़ाविया लफ़्ज़ों की ख़ू समझता है

शहपर रसूल

उस की बातें क्या करते हो वो लफ़्ज़ों का बानी था

शहपर रसूल

फिर से वही हालात हैं इम्काँ भी वही है

शहपर रसूल

मेरी नज़र का मुद्दआ उस के सिवा कुछ भी नहीं

शहपर रसूल

दिल में शोला था सो आँखों में नमी बनता गया

शहपर रसूल

यार को महरूम-ए-तमाशा किया

मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता

शोख़ी ने तेरी लुत्फ़ न रक्खा हिजाब में

मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता

जो कू-ए-दोस्त को जाऊँ तो पासबाँ के लिए

मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता

है बद बला किसी को ग़म-ए-जावेदाँ न हो

मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता

दिल का गिला फ़लक की शिकायत यहाँ नहीं

मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता

दस्त-ए-अदू से शब जो वो साग़र लिया किए

मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता

शरार-ए-जाँ से गुज़र गर्दिश-ए-लहू में आ

शीश मोहम्मद इस्माईल आज़मी

अब तो जिस रोज़ से रूठी है मोहब्बत उस की

शीश मोहम्मद इस्माईल आज़मी

दोस्ती इश्क़ और वफ़ादारी

शीन काफ़ निज़ाम

रीत पर जितने भी नविश्ते हैं

शीन काफ़ निज़ाम

अजनबी

शाज़ तमकनत

यही सफ़र की तमन्ना यही थकन की पुकार

शाज़ तमकनत

वो नियाज़-ओ-नाज़ के मरहले निगह-ओ-सुख़न से चले गए

शाज़ तमकनत

मेरी वहशत का तिरे शहर में चर्चा होगा

शाज़ तमकनत

कोई तन्हाई का एहसास दिलाता है मुझे

शाज़ तमकनत

छोड़ दूँ शहर तिरा छोड़ दूँ दुनिया तेरी

शाज़ तमकनत

बात हो दैर-ओ-हरम की या वतन की बात हो

शायान क़ुरैशी

हाथ उठाता हूँ मैं अब दुआ के लिए

शौक़ सालकी

नई बज़्म-ए-ऐश-ओ-नशात में ये मरज़ सुना है कि आम है

शौक़ बहराइची

गिन के देता है बला-नोशों को पैमाना अभी

शौक़ बहराइची

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