शरीर Poetry (page 13)

शिकस्ता जिस्म दरीदा जबीन की जानिब

शाहिद कमाल

नन्हा सा दिया है कि तह-ए-आब है रौशन

शाहिद कमाल

हवा की डोर में टूटे हुए तारे पिरोती है

शाहिद कमाल

फ़िक्र-ए-ईजाद में हूँ खोल नया दर कोई

शाहिद कमाल

ऐ ज़ौक़ अर्ज़-ए-हुनर हर्फ़-ए-ए'तिदाल में रख

शाहिद कमाल

रूह को क़ैद किए जिस्म के हालों में रहे

शाहिद कबीर

क्या फ़र्ज़ है ये जिस्म के ज़िंदाँ में सज़ा दे

शाहिद कबीर

कुछ देर काली रात के पहलू में लेट के

शाहिद कबीर

कर्ब चेहरे से मह-ओ-साल का धोया जाए

शाहिद कबीर

अंदर का सुकूत कह रहा है

शाहिद कबीर

फूलों से सज गई कहीं सब्ज़ा पहन लिया

शाहिद जमाल

एक तुम्हारे प्यार की ख़ातिर जग के दुख अपनाए थे

शाहिद इश्क़ी

उड़ता हुआ इक बादल था

शाहिद अज़ीज़

किसी की ज़ुल्फ़-ए-शिकन-दर-शिकन की बात हुई

शाहिद अख़्तर

ऊपर जो परिंद गा रहा है

शाहीन अब्बास

मिरे बनने से क्या क्या बन रहा था

शाहीन अब्बास

मुश्किल तो न था ऐसा भी अफ़्लाक से रिश्ता

शहबाज़ ख़्वाजा

ऐसे रखती है हमें तेरी मोहब्बत ज़िंदा

शहबाज़ ख़्वाजा

हयात में भी अजल का समाँ दिखाई दे

शहाब जाफ़री

मैं और तुम

शहाब अख़्तर

याँ से देंगे न तुम को जाने आज

शाह नसीर

दिल को किस सूरत से कीजे चश्म-ए-दिलबर से जुदा

शाह नसीर

क्या कहूँ कब धुआँ नहीं उठता

शाह हुसैन नहरी

रेग-ए-रवाँ पे नक़्श-ए-कफ़-ए-पा न देखना

शफ़क़त तनवीर मिर्ज़ा

रुकूँ तो रुकता है चलने पे साथ चलता है

शफ़ीक़ सलीमी

शक्ल-ए-मिज़्गाँ न ख़ार की सी है

शाद लखनवी

न दिल अपना न ग़म अपना न कोई ग़म-गुसार अपना

शाद अज़ीमाबादी

क्यूँ हो बहाना-जू न क़ज़ा सर से पाँव तक

शाद अज़ीमाबादी

हरगिज़ कभी किसी से न रखना दिला ग़रज़

शाद अज़ीमाबादी

फ़क़त शोर-ए-दिल-ए-पुर-आरज़ू था

शाद अज़ीमाबादी

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