शरीर Poetry (page 12)

अब के बरस

शहरयार

ज़मीं से ता-ब-फ़लक धुँद की ख़ुदाई है

शहरयार

ये क्या जगह है दोस्तो ये कौन सा दयार है

शहरयार

ये क्या हुआ कि तबीअ'त सँभलती जाती है

शहरयार

तिलिस्म ख़त्म चलो आह-ए-बे-असर का हुआ

शहरयार

तेरी साँसें मुझ तक आते बादल हो जाएँ

शहरयार

सभी को ग़म है समुंदर के ख़ुश्क होने का

शहरयार

नहीं रोक सकोगे जिस्म की इन परवाजों को

शहरयार

किस किस तरह से मुझ को न रुस्वा किया गया

शहरयार

हमारी आँख में नक़्शा ये किस मकान का है

शहरयार

गर्द को कुदूरतों की धो न पाए हम

शहरयार

आँख की ये एक हसरत थी कि बस पूरी हुई

शहरयार

आँधियाँ आती थीं लेकिन कभी ऐसा न हुआ

शहरयार

आँधी की ज़द में शम-ए-तमन्ना जलाई जाए

शहरयार

आहट जो सुनाई दी है हिज्र की शब की है

शहरयार

संग-ज़नों के वास्ते फिर नए रास्तों में है

शाहिदा तबस्सुम

जंगलों में बारिशें हैं दूर तक

शाहिदा तबस्सुम

सवाद-ए-शाम से ता-सुब्ह-ए-बे-किनार गई

शाहिदा हसन

हवा पे चल रहा है चाँद राह-वार की तरह

शाहिदा हसन

यूँ तो नहीं कि पहले सहारे बनाए थे

शाहिद ज़की

आँखों में है पर आँख ने देखा नहीं अभी

शाहिद शैदाई

ख़ौफ़ से अब यूँ न अपने घर का दरवाज़ा लगा

शाहिद मीर

फैला हुआ है जिस्म में तन्हाइयों का ज़हर

शाहिद माहुली

एक लम्हा

शाहिद माहुली

अजीब लोग

शाहिद माहुली

रग रग में मेरी फैल गया है ये कैसा ज़हर

शाहिद माहुली

कश्ती रवाँ-दवाँ थी समुंदर खुला हुआ

शाहिद माहुली

कश्ती रवाँ-दवाँ थी समुंदर खुला हुआ

शाहिद माहुली

हर दर-ओ-दीवार पे लर्ज़ां कोई पैकर लगे

शाहिद माहुली

बुझे बुझे से चराग़ों से सिलसिला पाया

शाहिद माहुली

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