शरीर Poetry (page 15)

ख़ुश-लिबासी है बड़ी चीज़ मगर क्या कीजे

सरवत हुसैन

यहाँ मज़ाफ़ात में

सरवत हुसैन

इतने बहुत से रंग

सरवत हुसैन

एक पुल बनाया जा रहा है

सरवत हुसैन

जाने उस ने क्या देखा शहर के मनारे में

सरवत हुसैन

घर से निकला तो मुलाक़ात हुई पानी से

सरवत हुसैन

महबूबा के लिए आख़िरी नज़्म

सरमद सहबाई

इस्तिआरे ढूँडता रहता हूँ

सरमद सहबाई

हाँ मेरी महबूबा

सरमद सहबाई

रौशनी रंगों में सिमटा हुआ धोका ही न हो

सरमद सहबाई

कभी होंटों पे ऐसा लम्स अपनी आँख खोले

सरफ़राज़ ज़ाहिद

सियाह रात के पहलू में जिस्म के अंदर

सरफ़राज़ ख़ालिद

मैं अपने-आप से आगे निकल गया हूँ बहुत

सरफ़राज़ ख़ालिद

अब जिस्म के अंदर से आवाज़ नहीं आती

सरफ़राज़ ख़ालिद

आँख ही आँख थी मंज़र भी नहीं था कोई

सरफ़राज़ ख़ालिद

ख़मोशी में छुपे लफ़्ज़ों के हुलिए याद आएँगे

सरदार सलीम

तमाम जिस्म की उर्यानियाँ थीं आँखों में

साक़ी फ़ारुक़ी

मुर्दा-ख़ाना

साक़ी फ़ारुक़ी

मैं और मैं!

साक़ी फ़ारुक़ी

फैंटेसी

साक़ी फ़ारुक़ी

दीवार

साक़ी फ़ारुक़ी

यूँ मिरे पास से हो कर न गुज़र जाना था

साक़ी फ़ारुक़ी

ये कौन आया शबिस्ताँ के ख़्वाब पहने हुए

साक़ी फ़ारुक़ी

वो सख़ी है तो किसी रोज़ बुला कर ले जाए

साक़ी फ़ारुक़ी

पाँव मारा था पहाड़ों पे तो पानी निकला

साक़ी फ़ारुक़ी

मुझ को मिरी शिकस्त की दोहरी सज़ा मिली

साक़ी फ़ारुक़ी

जान प्यारी थी मगर जान से बे-ज़ारी थी

साक़ी फ़ारुक़ी

इक याद की मौजूदगी सह भी नहीं सकते

साक़ी फ़ारुक़ी

ख़राब हो गया जब मेरे जिस्म का काग़ज़

संजय मिश्रा शौक़

फ़ज़ा-ए-ज़ेहन की जलती हवा बदलने तक

संजय मिश्रा शौक़

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