धूल Poetry (page 16)

माह-ए-मुनीर

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

पहुँचा मैं कू-ए-यार में जब सर लिए हुए

शमीम तारिक़

खंडर

शमीम करहानी

फ़रेब-ए-नज़र

शमीम करहानी

वहाँ खुले भी तो क्यूँकर बिसात-ए-हिकमत-ओ-फ़न

शमीम करहानी

सहर को दे के नई निकहत-ए-हयात गई

शमीम करहानी

माना कि सई-ए-इश्क़ का अंजाम-कार क्या

शमीम करहानी

ज़ेर-ए-ज़मीं दबी हुई ख़ाक को आसाँ कहो

शमीम हनफ़ी

सफ़र नसीब अगर हो तो ये बदन क्यूँ है

शमीम हनफ़ी

नीले पीले सियाह सुर्ख़ सफ़ेद सब थे शामिल इसी तमाशे में

शमीम हनफ़ी

हर नक़्श-ए-नवा लौट के जाने के लिए था

शमीम हनफ़ी

एक बेनाम-ओ-निशाँ रूह का पैकर हूँ मैं

शमीम हनफ़ी

बंद कर ले खिड़कियाँ यूँ रात को बाहर न देख

शमीम हनफ़ी

बंद कर के खिड़कियाँ यूँ रात को बाहर न देख

शमीम हनफ़ी

अब क़ैस है कोई न कोई आबला-पा है

शमीम हनफ़ी

ज़मीं चिल्लाई चीख़ी बिलबिला के

शमीम अब्बास

किसी का तीर किसी की कमाँ हो ठीक नहीं

शमीम अब्बास

न संग-ए-राह न सद्द-ए-क़ुयूद की सूरत

शाम रिज़वी

उल्फ़त में बिगड़ कर भी इक वज़्अ निकाली है

शाकिर इनायती

ज़िंदगी यूँ तो बहुत अय्यार थी चालाक थी

शकील शम्सी

उम्र का एक और साल गया

शकील जमाली

तुम शुजाअ'त के कहाँ क़िस्से सुनाने लग गए

शकील जमाली

अश्क पीने के लिए ख़ाक उड़ाने के लिए

शकील जमाली

ज़लज़ला

शकील बदायुनी

रौशनी साया-ए-ज़ुल्मात से आगे न बढ़ी

शकील बदायुनी

राह-ए-ख़ुदा में आलम-ए-रिन्दाना मिल गया

शकील बदायुनी

हुई हम से ये नादानी तिरी महफ़िल में आ बैठे

शकील बदायुनी

बेकार गई आड़ तिरे पर्दा-ए-दर की

शकील बदायुनी

संग थे पिघले तो पानी हो गए

शकील आज़मी

राज़ में रख तिरी रुस्वाई का क़िस्सा मैं हूँ

शकील आज़मी

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