खाली Poetry (page 22)

सफ़ीर-ए-लैला-2

अली अकबर नातिक़

हिज्र बना आज़ार सफ़र कैसे कटता

अली अकबर मंसूर

बादा-ख़ाने की रिवायत को निभाना चाहिए

अलीम उस्मानी

निकल रहा हूँ यक़ीं की हद से गुमाँ की जानिब

अकरम महमूद

एक हुस्न-फ़रोश से

अख़्तर शीरानी

तुम अपनी ज़बाँ ख़ाली कर के ऐ नुक्ता-वरो पछताओगे

अख़तर मुस्लिमी

मंज़िलों के फ़ासले दीवार-ओ-दर में रह गए

अख़्तर होशियारपुरी

चर्ख़ भी छू लें तो जाना है इसी मिट्टी में

अख़लाक़ बन्दवी

वहम ही होगा मगर रोज़ कहाँ होता है

अखिलेश तिवारी

डिनर से तुम को फ़ुर्सत कम यहाँ फ़ाक़े से कम ख़ाली

अकबर इलाहाबादी

आह जो दिल से निकाली जाएगी

अकबर इलाहाबादी

आह जो दिल से निकाली जाएगी

अकबर इलाहाबादी

और तो ख़ैर क्या रह गया

अजमल सिराज

हम तिरे ख़्वाबों की जन्नत से निकल कर आ गए

ऐतबार साजिद

डाइरी में सारे अच्छे शेर चुन कर लिख लिए

ऐतबार साजिद

कहा दिन को भी ये घर किस लिए वीरान रहता है

ऐतबार साजिद

बंद दरीचे सूनी गलियाँ अन-देखे अनजाने लोग

ऐतबार साजिद

आने वाली थी ख़िज़ाँ मैदान ख़ाली कर दिया

ऐतबार साजिद

जुरअत ऐ दिल मय ओ मीना है वो ख़ुद-काम भी है

ऐश देहलवी

बज़्म ख़ाली नहीं मेहमान निकल आते हैं

ऐन ताबिश

मक़ाम-ए-हिज्र कहीं इम्तिहाँ से ख़ाली है

अहमद निसार

ज़रुरत-ए-इत्तिहाद

अहमक़ फफूँदवी

यूँ ज़माने में मिरा जिस्म बिखर जाएगा

अहमद ज़फ़र

यादों की तज्सीम पे मेहनत होती है

अहमद शहरयार

फैल रहा है ये जो ख़ाली होने का डर मुझ में

अहमद शहरयार

साग़र क्यूँ ख़ाली है मिरा ऐ साक़ी तिरे मयख़ाने में

अहमद शाहिद ख़ाँ

लगती हैं गाली बिल्डिंगें

अहमद रज़ी बछरायूनी

रेस्तोराँ

अहमद नदीम क़ासमी

एक नज़्म

अहमद नदीम क़ासमी

दिल भर आया काग़ज़-ए-ख़ाली की सूरत देख कर

अहमद मुश्ताक़

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