भगवान Poetry (page 43)
ज़बाँ पे हर्फ़-ए-शिकायत अरे मआज़-अल्लाह
हादी मछलीशहरी
हज़ार ख़ाक के ज़र्रों में मिल गया हूँ मैं
हादी मछलीशहरी
तुम से पहले वो जो इक शख़्स यहाँ तख़्त-नशीं था
हबीब जालिब
ज़ुल्मत को ज़िया सरसर को सबा बंदे को ख़ुदा क्या लिखना
हबीब जालिब
मुशीर
हबीब जालिब
मौलाना
हबीब जालिब
ख़ुदा हमारा है
हबीब जालिब
अहद-ए-सज़ा
हबीब जालिब
तुम से पहले वो जो इक शख़्स यहाँ तख़्त-नशीं था
हबीब जालिब
न डगमगाए कभी हम वफ़ा के रस्ते में
हबीब जालिब
'मीर'-ओ-'ग़ालिब' बने 'यगाना' बने
हबीब जालिब
कराहते हुए इंसान की सदा हम हैं
हबीब जालिब
हम ने दिल से तुझे सदा माना
हबीब जालिब
कसी हैं भब्तियाँ मस्जिद में रीश-ए-वाइज़ पर
हबीब मूसवी
दिल लिया है तो ख़ुदा के लिए कह दो साहब
हबीब मूसवी
शब को नाला जो मिरा ता-ब-फ़लक जाता है
हबीब मूसवी
जबीन पर क्यूँ शिकन है ऐ जान मुँह है ग़ुस्से से लाल कैसा
हबीब मूसवी
हुए ख़ल्क़ जब से जहाँ में हम हवस-ए-नज़ारा-ए-यार है
हबीब मूसवी
है आठ पहर तू जल्वा-नुमा तिमसाल-ए-नज़र है परतव-ए-रुख़
हबीब मूसवी
फ़िराक़ में दम उलझ रहा है ख़याल-ए-गेसू में जांकनी है
हबीब मूसवी
भला हो जिस काम में किसी का तो उस में वक़्फ़ा न कीजिएगा
हबीब मूसवी
अक़्ल पर पत्थर पड़े उल्फ़त में दीवाना हुआ
हबीब मूसवी
ये कैफ़ कैफ़-ए-मोहब्बत है कोई क्या जाने
हबीब अशअर देहलवी
एक मैं हूँ और लाख मसाइल ख़ुदा गवाह
गुलज़ार वफ़ा चौदरी
फ़लाह-ए-आदमियत में सऊबत सह के मर जाना
गुलज़ार देहलवी
उसी का ईमाँ बदल गया है
गुलज़ार
वो ख़त के पुर्ज़े उड़ा रहा था
गुलज़ार
ऐसा ख़ामोश तो मंज़र न फ़ना का होता
गुलज़ार
न कोई दीन होता है न कोई ज़ात होती है
गुलशन बरेलवी
शजर-ए-उम्मीद भी जल गया वो वफ़ा की शाख़ भी जल गई
गुलनार आफ़रीन
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