मारा Poetry (page 9)

फिर किसी ख़्वाब के पर्दे से पुकारा जाऊँ

आदिल मंसूरी

तिरे रुख़सारा-ए-सीमीं पे मारा ज़ुल्फ़ ने कुंडल

आबरू शाह मुबारक

निगह तेरी का इक ज़ख़्मी न तन्हा दिल हमारा है

आबरू शाह मुबारक

आया है सुब्ह नींद सूँ उठ रसमसा हुआ

आबरू शाह मुबारक

मिट्टी से एक मुकालिमा

अबरार अहमद

सुनाया यार नीं आ कर दो तारा

अब्दुल वहाब यकरू

जीत कर बाज़ी-ए-उल्फ़त को भी हारा जाए

अब्दुल रहमान ख़ान वासिफ़ी बहराईची

कुछ तौर नहीं बचने का ज़िन्हार हमारा

अब्दुल रहमान एहसान देहलवी

याद कर कर के उसे वक़्त गुज़ारा जाए

अब्बास ताबिश

वापसी

आशुफ़्ता चंगेज़ी

ग़ैरत-ए-इश्क़ का ये एक सहारा न गया

आल-ए-अहमद सूरूर

शिद्दत-ए-ज़ात ने ये हाल बनाया अपना

आग़ा अकबराबादी

नहीं मुमकिन कि तिरे हुक्म से बाहर मैं हूँ

आग़ा अकबराबादी

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