नाम Poetry (page 68)

जब अपने पैरहन से ख़ुशबू तुम्हारी आई

असद भोपाली

लेता नहीं किसी का पस-ए-मर्ग कोई नाम

असअ'द बदायुनी

एक नज़्म

असअ'द बदायुनी

ये लोग ख़्वाब बहुत कर्बला के देखते हैं

असअ'द बदायुनी

वो एक नाम जो दरिया भी है किनारा भी

असअ'द बदायुनी

सैल-ए-गिर्या का सीने से रिश्ता बहुत

असअ'द बदायुनी

सच बोल के बचने की रिवायत नहीं कोई

असअ'द बदायुनी

रौशनी में किस क़दर दीवार-ओ-दर अच्छे लगे

असअ'द बदायुनी

पोशीदा क्यूँ है तूर पे जल्वा दिखा के देख

असअ'द बदायुनी

फिर चाहे तो न आना ओ आन-बान वाले

आरज़ू लखनवी

न कोई जल्वती न कोई ख़ल्वती न कोई ख़ास था न कोई आम था

आरज़ू लखनवी

न कर तलाश-ए-असर तीर है लगा न लगा

आरज़ू लखनवी

ख़ाली बैठे क्यूँ दिन काटें आओ रे जी इक काम करें

आरज़ू लखनवी

कहीं सर पटकते दीवाने कहीं पर झुलसते परवाने

आरज़ू लखनवी

जितना था सरगर्म-ए-कार उतना ही दिल नाकाम था

आरज़ू लखनवी

हाँ दीद का इक़रार अगर हो तो अभी हो

आरज़ू लखनवी

दम-ब-ख़ुद बैठ के ख़ुद जैसे ज़बाँ गीली है

आरज़ू लखनवी

बग़ौर देख रहा है अदा-शनास मुझे

आरज़ू लखनवी

उफ़ुक़ के ख़ूनीं धुँदलकों का सुब्ह नाम नहीं

अर्शी भोपाली

क़ल्ब-ओ-नज़र का सुकूँ और कहाँ दोस्तो

अरशद सिद्दीक़ी

न पयाम चाहते हैं न कलाम चाहते हैं

अरशद सिद्दीक़ी

फ़ज़ाएँ कैफ़-ए-बहाराँ से जब महकती हैं

अरशद सिद्दीक़ी

ख़ुदी के ज़ो'म में ऐसा वो मुब्तला हुआ है

अरशद महमूद अरशद

ये बारीक उन की कमर हो गई

अरशद अली ख़ान क़लक़

वा'दा-ख़िलाफ़ कितने हैं ऐ रश्क-ए-माह आप

अरशद अली ख़ान क़लक़

परतव-ए-रुख़ का तिरे दिल में गुज़र रहता है

अरशद अली ख़ान क़लक़

जुनूँ बरसाए पत्थर आसमाँ ने मज़रा-ए-जाँ पर

अरशद अली ख़ान क़लक़

दिल में आते ही ख़ुशी साथ ही इक ग़म आया

अरशद अली ख़ान क़लक़

बशर के फ़ैज़-ए-सोहबत से लियाक़त आ ही जाती है

अरशद अली ख़ान क़लक़

आशिक़-ए-गेसू-ओ-क़द तेरे गुनहगार हैं सब

अरशद अली ख़ान क़लक़

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