सबसे Poetry (page 124)

ज़ंग-ख़ुर्दा लब अचानक आफ़्ताबी हो गए

आतिफ़ कमाल राना

उन को मैं ने अपना कहा है

आसी रामनगरी

ख़्वाब में आओ मिरे रंगीन ख़्वाबों की तरह

आसी रामनगरी

बाब-ए-क़फ़स खुलने को खुला है

आसी रामनगरी

क़तरा वही कि रू-कश-ए-दरिया कहें जिसे

आसी ग़ाज़ीपुरी

कुछ कहूँ कहना जो मेरा कीजिए

आसी ग़ाज़ीपुरी

हमें भी आज ही करना था इंतिज़ार उस का

आशुफ़्ता चंगेज़ी

दरियाओं की नज़्र हुए

आशुफ़्ता चंगेज़ी

परछाइयाँ पकड़ने वाले

आशुफ़्ता चंगेज़ी

अक़्द-नामे

आशुफ़्ता चंगेज़ी

ये भी नहीं बीमार न थे

आशुफ़्ता चंगेज़ी

तुम ने लिक्खा है लिखो कैसा हूँ मैं

आशुफ़्ता चंगेज़ी

ठिकाने यूँ तो हज़ारों तिरे जहान में थे

आशुफ़्ता चंगेज़ी

सदाएँ क़ैद करूँ आहटें चुरा ले जाऊँ

आशुफ़्ता चंगेज़ी

कोई ग़ुल हुआ था न शोर-ए-ख़िज़ाँ

आशुफ़्ता चंगेज़ी

किस की तलाश है हमें किस के असर में हैं

आशुफ़्ता चंगेज़ी

हवाएँ तेज़ थीं ये तो फ़क़त बहाने थे

आशुफ़्ता चंगेज़ी

दूर तक फैला समुंदर मुझ पे साहिल हो गया

आशुफ़्ता चंगेज़ी

दिल डूबने लगा है तवानाई चाहिए

आशुफ़्ता चंगेज़ी

धूप के रथ पर हफ़्त अफ़्लाक

आशुफ़्ता चंगेज़ी

भीनी ख़ुशबू सुलगती साँसों में

आशुफ़्ता चंगेज़ी

बदन भीगेंगे बरसातें रहेंगी

आशुफ़्ता चंगेज़ी

बादबाँ खोलेगी और बंद-ए-क़बा ले जाएगी

आशुफ़्ता चंगेज़ी

ख़ुद से मैं बे-यक़ीं हुआ ही नहीं

आस मोहम्मद मोहसिन

मेरे अपने अंदर एक भँवर था जिस में

आनिस मुईन

तू मेरा है

आनिस मुईन

वो कुछ गहरी सोच में ऐसे डूब गया है

आनिस मुईन

जीवन को दुख दुख को आग और आग को पानी कहते

आनिस मुईन

उस के चेहरे पे तबस्सुम की ज़िया आएगी

आनन्द सरूप अंजुम

हो गए आँगन जुदा और रास्ते भी बट गए

आनन्द सरूप अंजुम

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