आंसू Poetry (page 27)
दिल आया इस तरह आख़िर फ़रेब-ए-साज़-ओ-सामाँ में
अज़ीज़ लखनवी
बढ़ गईं गुस्ताख़ियाँ मेरी सज़ा के साथ साथ
अज़ीज़ हैदराबादी
देखिए चलता है पैमाना किधर से पहले
अज़हर लखनवी
ये क्या कि रंग हाथों से अपने छुड़ाएँ हम
अज़हर इनायती
उदास उदास तबीअ'त जो थी बहलने लगी
अज़हर इनायती
अपने आँचल में छुपा कर मिरे आँसू ले जा
अज़हर इनायती
कभी नाकामियों का अपनी हम मातम नहीं करते
आज़ाद गुरदासपुरी
वो जो किसी का रूप धार कर आया था
आज़ाद गुलाटी
बहुत लम्बा सफ़र तपती सुलगती ख़्वाहिशों का था
आज़ाद गुलाटी
अश्क को दरिया बनाया आँख को साहिल किया
औरंगज़ेब
न जिस का कोई सहारा हो वो किधर जाए
औलाद अली रिज़वी
मिरी मुश्किल अगर आसाँ बना देते तो अच्छा था
अतीक़ुर्रहमान सफ़ी
जिस की ख़ातिर मैं ने दुनिया की तरफ़ देखा न था
अतीक़ अंज़र
चंद लम्हों को सही था साथ में रहना बहुत
अतीक़ इलाहाबादी
रात वहशत से गुरेज़ाँ था मैं आहू की तरह
अता तुराब
कब कहाँ क्या मिरे दिलदार उठा लाएँगे
अता तुराब
ख़्वाब की दिल्ली
अता आबिदी
रूदाद-ए-ग़म-ए-उल्फ़त उन से हम क्या कहते क्यूँकर कहते
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्र-ए-दिल
असरार-उल-हक़ मजाज़
नौ-जवान ख़ातून से
असरार-उल-हक़ मजाज़
एक ग़मगीन याद
असरार-उल-हक़ मजाज़
तस्कीन-ए-दिल-ए-महज़ूँ न हुई वो सई-ए-करम फ़रमा भी गए
असरार-उल-हक़ मजाज़
सीना-ए-संग में ढूँढता है गुदाज़
असरारुल हक़ असरार
ज़िंदगी उलझी है बिखरे हुए गेसू की तरह
असरा रिज़वी
तेरा सूरज आएगा
असलम राशिद
जब मैं उस के गाँव से बाहर निकला था
असलम कोलसरी
ज़ीस्त की धूप से यूँ बच के निकलता क्यूँ है
असलम हबीब
कट गईं सारी पतंगें डोर से
असलम हबीब
धनक की बूँद
असलम फ़र्रुख़ी
सिलसिला रोने का सदियों से चला आता है
असलम आज़ाद
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