अंदर Poetry (page 31)

वहशत

अम्बरीन सलाहुद्दीन

सर-ए-मिज़्गाँ

अम्बरीन सलाहुद्दीन

खिड़की

अम्बरीन सलाहुद्दीन

रस्ता रोकती ख़ामोशी ने कौन सी बात सुनानी है

अम्बरीन सलाहुद्दीन

जब अश्कों में सदाएँ ढल रही थीं

अम्बरीन सलाहुद्दीन

बाम से ढल चुका है आधा दिन

अम्बरीन सलाहुद्दीन

रंग काला है न है पैकर सियाह

अम्बर शमीम

वो लम्हा मुझ को शश्दर कर गया था

अम्बर बहराईची

मिट्टी का दिया

अल्ताफ़ हुसैन हाली

साल ये कौन सा नया है मुझे

आलोक मिश्रा

तेरे पहलू में जी रही थी कभी

अलमास शबी

लेनिन

अल्लामा इक़बाल

फिर चराग़-ए-लाला से रौशन हुए कोह ओ दमन

अल्लामा इक़बाल

मेरा वजूद जज़्ब हुआ तेरे जिस्म में

अलीउद्दीन नवेद

एहसास देख पाए वो मंज़र तलाश कर

अलीउद्दीन नवेद

मैं बड़ी मुश्किल में हूँ

अली ज़हीर लखनवी

दिल ये कहता है कि इक आलम-ए-मुज़्तर देखूँ

अली ज़हीर लखनवी

मिरे अज़ीज़ो, मिरे रफ़ीक़ो

अली सरदार जाफ़री

हसीन-तर

अली सरदार जाफ़री

जन्म दिन

अली साहिल

सर्कस

अली इमरान

मैं कब से मरा अपने अंदर पड़ा हूँ

अली इमरान

इतनी बार मोहब्बत करना कितना मुश्किल हो जाता है

अली इमरान

प्यासा ऊँट

अली अकबर नातिक़

हमारी आँख ने देखे हैं ऐसे मंज़र भी

अली अहमद जलीली

एक खिड़की गली की खुली रात भर

अली अहमद जलीली

लहू की सूखी हुई झील में उतर कर यूँ

अलीम सबा नवेदी

सिसकता चीख़ता एहसास था मिरे अंदर

अलीम सबा नवेदी

हर घर में कोई तह-ख़ाना होता है

आलम ख़ुर्शीद

कोई इल्ज़ाम मेरे नाम मेरे सर नहीं आया

अकरम नक़्क़ाश

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