बात Poetry (page 108)

यूँ तो पहने हुए पैराहन-ए-ख़ार आता हूँ

अहमद नदीम क़ासमी

वो कोई और न था चंद ख़ुश्क पत्ते थे

अहमद नदीम क़ासमी

तू बिगड़ता भी है ख़ास अपने ही अंदाज़ के साथ

अहमद नदीम क़ासमी

फूलों से लहू कैसे टपकता हुआ देखूँ

अहमद नदीम क़ासमी

खड़ा था कब से ज़मीं पीठ पर उठाए हुए

अहमद नदीम क़ासमी

जो लोग दुश्मन-ए-जाँ थे वही सहारे थे

अहमद नदीम क़ासमी

जाने कहाँ थे और चले थे कहाँ से हम

अहमद नदीम क़ासमी

अपने माहौल से थे क़ैस के रिश्ते क्या क्या

अहमद नदीम क़ासमी

तन्हाई में करनी तो है इक बात किसी से

अहमद मुश्ताक़

संग उठाना तो बड़ी बात है अब शहर के लोग

अहमद मुश्ताक़

ये कौन ख़्वाब में छू कर चला गया मिरे लब

अहमद मुश्ताक़

ये हम ग़ज़ल में जो हर्फ़-ओ-बयाँ बनाते हैं

अहमद मुश्ताक़

उदास कर के दरीचे नए मकानों के

अहमद मुश्ताक़

शाम-ए-ग़म याद है कब शम्अ' जली याद नहीं

अहमद मुश्ताक़

नाला-ए-ख़ूनीं से रौशन दर्द की रातें करो

अहमद मुश्ताक़

ले के हम-राह छलकते हुए पैमाने को

अहमद मुश्ताक़

किस शय पे यहाँ वक़्त का साया नहीं होता

अहमद मुश्ताक़

ख़ैर औरों ने भी चाहा तो है तुझ सा होना

अहमद मुश्ताक़

हाथ से नापता हूँ दर्द की गहराई को

अहमद मुश्ताक़

इक उम्र की और ज़रूरत है वही शाम-ओ-सहर करने के लिए

अहमद मुश्ताक़

इक फूल मेरे पास था इक शम्अ' मेरे साथ थी

अहमद मुश्ताक़

ये शुग़्ल-ए-ज़बानी भी बे-सर्फ़ा नहीं आख़िर

अहमद महफ़ूज़

लोग कहते थे वो मौसम ही नहीं आने का

अहमद महफ़ूज़

छोड़ो अब उस चराग़ का चर्चा बहुत हुआ

अहमद महफ़ूज़

आया ही नहीं कोई बोझ अपना उठाने को

अहमद महफ़ूज़

वो ज़हर है फ़ज़ाओं में कि आदमी की बात क्या

अहमद ख़याल

कोई हैरत है न इस बात का रोना है हमें

अहमद ख़याल

कोई हैरत है न इस बात का रोना है हमें

अहमद ख़याल

ग़ुबार-ए-अब्र बन गया कमाल कर दिया गया

अहमद ख़याल

ग़ुबार अब्र बन गया कमाल कर दिया गया

अहमद ख़याल

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