बात Poetry (page 68)

रुख़-ए-निगार से है सोज़-ए-जावेदानी-ए-शमा

ग़ालिब

पए-नज़्र-ए-करम तोहफ़ा है शर्म-ए-ना-रसाई का

ग़ालिब

नुक्ता-चीं है ग़म-ए-दिल उस को सुनाए न बने

ग़ालिब

न था कुछ तो ख़ुदा था कुछ न होता तो ख़ुदा होता

ग़ालिब

मिलती है ख़ू-ए-यार से नार इल्तिहाब में

ग़ालिब

मस्जिद के ज़ेर-ए-साया ख़राबात चाहिए

ग़ालिब

मंज़ूर थी ये शक्ल तजल्ली को नूर की

ग़ालिब

कोई उम्मीद बर नहीं आती

ग़ालिब

की वफ़ा हम से तो ग़ैर इस को जफ़ा कहते हैं

ग़ालिब

कहते तो हो तुम सब कि बुत-ए-ग़ालिया-मू आए

ग़ालिब

जिस ज़ख़्म की हो सकती हो तदबीर रफ़ू की

ग़ालिब

इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना

ग़ालिब

हवस को है नशात-ए-कार क्या क्या

ग़ालिब

हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है

ग़ालिब

है बस-कि हर इक उन के इशारे में निशाँ और

ग़ालिब

घर जब बना लिया तिरे दर पर कहे बग़ैर

ग़ालिब

ग़म खाने में बूदा दिल-ए-नाकाम बहुत है

ग़ालिब

गर ख़ामुशी से फ़ाएदा इख़्फ़ा-ए-हाल है

ग़ालिब

गई वो बात कि हो गुफ़्तुगू तो क्यूँकर हो

ग़ालिब

बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मिरे आगे

ग़ालिब

तुम आओगे

गीताञ्जलि राय

नफ़रत

गीताञ्जलि राय

नदी

गीताञ्जलि राय

इंतिज़ार-ए-दीद में यूँ आँख पथराई कि बस

ग़व्वास क़ुरैशी

इस बात को वैसे तो छुपाया न गया है

गौतम राजऋषि

हवा जब किसी की कहानी कहे है

गौतम राजऋषि

लहजा तो बदल चुभती हुई बात से पहले

गौहर होशियारपुरी

शाइरी बात नहीं गर्म-ए-सुख़न होने की

गौहर होशियारपुरी

सर पर कोई आसमान रख दे

गौहर होशियारपुरी

मता-ए-इश्क़ ज़रा और सर्फ़-ए-नाज़ तो हो

गौहर होशियारपुरी

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