दामन Poetry (page 28)

ख़ुद मसीहा ख़ुद ही क़ातिल हैं तो वो भी क्या करें

फ़ानी बदायुनी

हर तबस्सुम को चमन में गिर्या-सामाँ देख कर

फ़ानी बदायुनी

आह से या आह की तासीर से

फ़ानी बदायुनी

कोई समझेगा क्या राज़-ए-गुलशन

फ़ना निज़ामी कानपुरी

गुल तो गुल ख़ार तक चुन लिए हैं

फ़ना निज़ामी कानपुरी

कोई समझेगा क्या राज़-ए-गुलशन

फ़ना निज़ामी कानपुरी

जब भी नज़्म-ए-मै-कदा बदला गया

फ़ना निज़ामी कानपुरी

ग़म हर इक आँख को छलकाए ज़रूरी तो नहीं

फ़ना निज़ामी कानपुरी

ये तमन्ना है कि इस तरह मुसलमाँ होता

फ़ना बुलंदशहरी

उन के जल्वों पे हमा-वक़्त नज़र होती है

फ़ना बुलंदशहरी

जल्वा जो तिरे रुख़ का एहसास में ढल जाए

फ़ना बुलंदशहरी

ऐ सनम देर न कर अंजुमन-आरा हो जा

फ़ना बुलंदशहरी

ग़ज़लें लिख लिख पागल होने वाला हूँ

फख़्र अब्बास

तसव्वुर में कोई आया सुकून-ए-क़ल्ब-ओ-जाँ हो कर

फ़ैज़ी निज़ाम पुरी

फिर ज़बान-ए-इश्क़ चश्म-ए-ख़ूँ-फिशाँ होने लगी

फ़ैज़ी निज़ाम पुरी

कोई तसव्वुर में जल्वा-गर है बहार दिल में समा रही है

फ़ैज़ी निज़ाम पुरी

गुलों के चेहरा-ए-रंगीं पे वो निखार नहीं

फ़ैज़ी निज़ाम पुरी

तह-ए-नुजूम

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

सुब्ह-ए-आज़ादी (अगस्त-47)

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

शीशों का मसीहा कोई नहीं

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

शाम

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

रंग है दिल का मिरे

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

मर्ग-ए-सोज़-ए-मोहब्बत

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

हम तो मजबूर-ए-वफ़ा हैं

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

हम तो मजबूर थे इस दिल से

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

बुनियाद कुछ तो हो

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

बोल

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

यूँ बहार आई है इस बार कि जैसे क़ासिद

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

सभी कुछ है तेरा दिया हुआ सभी राहतें सभी कुल्फ़तें

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

कई बार इस का दामन भर दिया हुस्न-ए-दो-आलम से

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

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