दामन Poetry (page 32)

वो सौ सौ अठखटों से घर से बाहर दो क़दम निकले

ज़फ़र

सब रंग में उस गुल की मिरे शान है मौजूद

ज़फ़र

निशान-ए-ज़ख़्म पे निश्तर-ज़नी जो होने लगी

बद्र-ए-आलम ख़लिश

नहीं नहीं ये मिरा अक्स हो नहीं सकता

बाबर रहमान शाह

हाथ खोल दिए जाएँ

अज़रा अब्बास

चाँद सा चेहरा कुछ इतना बेबाक हुआ

अज़्म शाकरी

सोज़िश-ए-ग़म के सिवा काहिश-ए-फ़ुर्क़त के सिवा

अज़ीज़ वारसी

इक हम कि उन के वास्ते महव-ए-फ़ुग़ाँ रहे

अज़ीज़ वारसी

क़िस्सा-ए-दर्द

अज़ीज़ तमन्नाई

हर आईना इक अक्स-ए-नौ ढूँडता है

अज़ीज़ तमन्नाई

चाँदनी रात में

अज़ीज़ तमन्नाई

करो तलाश हद-ए-आसमाँ मिलने न मिले

अज़ीज़ तमन्नाई

अज़ल-अबद

अज़ीज़ क़ैसी

ये ग़लत है ऐ दिल-ए-बद-गुमाँ कि वहाँ किसी का गुज़र नहीं

अज़ीज़ लखनवी

बाज़ी-ए-इश्क़ मरे बैठे हैं

अज़ीज़ लखनवी

लिखी हुई जो तबाही है उस से क्या जाता

अज़ीज़ हामिद मदनी

अच्छाई से नाता जोड़ वर्ना फिर पछताएगा

अज़ीज़ अन्सारी

इस को कोई ग़म नहीं है जिस का घर पत्थर का है

अज़हर नैयर

ये मोहब्बत का फ़साना भी बदल जाएगा

अज़हर लखनवी

जल्वे हवा के दोश ये कोई घटा के देख

अज़हर लखनवी

नीम-शब आतिश-ए-फ़रियाद-ए-असीराँ रौशन

अज़ीम मुर्तज़ा

फ़ित्ना-सामाँ ही नहीं फ़ित्ना-ए-सामाँ निकले

अज़ीम मुर्तज़ा

पेड़ आँगन के तिरे जब बारवर हो जाएँगे

आज़ाद गुरदासपुरी

कभी नाकामियों का अपनी हम मातम नहीं करते

आज़ाद गुरदासपुरी

दिल में कुछ दर्द सिवा है यारो

अय्यूब रूमानी

उतरन पहनोगे

अय्यूब ख़ावर

ख़्वाहिशें दुनिया की बार-ए-दोश-ओ-गर्दन हो गईं

औज लखनवी

अगर यक़ीन न रखते गुमान तो रखते

अतहर नासिक

इक आग ग़म-ए-तन्हाई की जो सारे बदन में फैल गई

अतहर नफ़ीस

वो इश्क़ जो हम से रूठ गया अब उस का हाल बताएँ क्या

अतहर नफ़ीस

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