दामन Poetry (page 31)

बज़्म-ए-दुश्मन में बुलाते हो ये क्या करते हो

बेख़ुद देहलवी

यूँ तो कहने को तिरी राह का पत्थर निकला

बेकल उत्साही

तिरे इश्क़ में ज़िंदगानी लुटा दी

बहज़ाद लखनवी

फ़रियाद है अब लब पर जब अश्क-फ़िशानी थी

बहज़ाद लखनवी

दिल मेरा तेरा ताब-ए-फ़रमाँ है क्या करूँ

बहज़ाद लखनवी

बरहमन मुझ को बनाना न मुसलमाँ करना

बेदम शाह वारसी

अपने दीदार की हसरत में तू मुझ को सरापा दिल कर दे

बेदम शाह वारसी

तरहदार कहाँ से लाऊँ

बेबाक भोजपुरी

अहसन तक़्वीम

बेबाक भोजपुरी

राज़ है इबरत-असर फ़ितरत की हर तहरीर का

बेबाक भोजपुरी

लहू टपका किसी की आरज़ू से

बयान मेरठी

चराग़-ए-हुस्न है रौशन किसी का

बयान मेरठी

ऐ जुनूँ हाथ के चलते ही मचल जाऊँगा

बयान मेरठी

आएँगे गर उन्हें ग़ैरत होगी

बयान मेरठी

हम सरगुज़िश्त क्या कहें अपनी कि मिस्ल-ए-ख़ार

बयाँ अहसनुल्लाह ख़ान

मेरे रोने पर किसी की चश्म गिर्यां हाए हाए

बासित भोपाली

ज़ौक़-ए-उल्फ़त अब भी है राहत का अरमाँ अब भी है

बशीरुद्दीन अहमद देहलवी

यूँ खुल गया है राज़-ए-शिकस्त-ए-तलब कभी

बशीर ज़ैदी असीर

मिरे बदन में छुपी आग को हवा देगा

बशीर फ़ारूक़ी

मैं तुम को भूल भी सकता हूँ इस जहाँ के लिए

बशीर बद्र

अज़ल-ता-अबद

बशर नवाज़

रोज़ कहाँ से कोई नया-पन अपने आप में लाएँगे

बशर नवाज़

रब्त हर बज़्म से टूटे तिरी महफ़िल के सिवा

बशर नवाज़

लब-ए-रंगीं से अगर तू गुहर-अफ़शाँ होता

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

ये रुख़-ए-यार नहीं ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ के तले

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

मेरी गो आह से जंगल न जले ख़ुश्क तो हो

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

आवे जो नाज़ से मिरा वो बुत-ए-सीम-बर ब-बर

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

आवे जो नाज़ से मिरा वो बुत-ए-सीम-बर ब-बर

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

सर्द, तारीक रात

बलराज कोमल

हम न बुत-ख़ाने में ने मस्जिद-ए-वीराँ में रहे

बहराम जी

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