दामन Poetry (page 34)

न ये शीशा न ये साग़र न ये पैमाना बने

असग़र गोंडवी

हुस्न को वुसअतें जो दीं इश्क़ को हौसला दिया

असग़र गोंडवी

बाग़ में फूल खिले मौसम-ए-सौदा आया

असीर लखनवी

सहरा से चले हैं सू-ए-गुलशन

असर लखनवी

मुझ को हर फूल सुनाता था फ़साना तेरा

असर लखनवी

भूले अफ़्साने वफ़ा के याद दिल्वाते हुए

असर लखनवी

ये आँसू ढूँडता है तेरा दामन

असद भोपाली

न साथी है न मंज़िल का पता है

असद भोपाली

ग़म-ए-हयात से जब वास्ता पड़ा होगा

असद भोपाली

अज़ल के दिन जिन्हें देखा था बज़्म-ए-हुस्न-ए-पिन्हाँ में

आरज़ू सहारनपुरी

नज़र बचा के जो आँसू किए थे मैं ने पाक

आरज़ू लखनवी

किस गुल की बू है दामन-ए-दिल में बसी हुई

आरज़ू लखनवी

दफ़अतन तर्क-ए-तअल्लुक़ में भी रुस्वाई है

आरज़ू लखनवी

आराम के थे साथी क्या क्या जब वक़्त पड़ा तो कोई नहीं

आरज़ू लखनवी

यक़ीन-ए-सुब्ह-ए-चमन है कितना शुऊर-ए-अब्र-ए-बहार क्या है

अर्शी भोपाली

उफ़ुक़ के ख़ूनीं धुँदलकों का सुब्ह नाम नहीं

अर्शी भोपाली

दिल में आते ही ख़ुशी साथ ही इक ग़म आया

अरशद अली ख़ान क़लक़

बुत-परस्ती ने किया आशिक़-ए-यज़्दाँ मुझ को

अरशद अली ख़ान क़लक़

बे-ज़बानों को भी गोयाई सिखाना चाहिए

अरशद अली ख़ान क़लक़

अदा से देख लो जाता रहे गिला दिल का

अरशद अली ख़ान क़लक़

दरवाज़ा तिरे शहर का वा चाहिए मुझ को

अर्श सिद्दीक़ी

बैठा हूँ वक़्फ़-ए-मातम-ए-हस्ती मिटा हुआ

अर्श सिद्दीक़ी

खिंच के महबूब के दामन की तरफ़

अर्श मलसियानी

आग ही आग है गुलशन ये कोई क्या जाने

अर्श मलसियानी

जाने किस आलम-ए-एहसास में खोए हुए हैं

अरमान नज्मी

कैसा मातम कैसा रोना मिट्टी का

आरिफ़ शफ़ीक़

सब लहू जम गया उबाल के बीच

आरिफ़ इमाम

चाँद मेरे घर में उतरा था कहीं डूबा न था

आरिफ़ अब्दुल मतीन

मेरे ज़ेहन-ओ-दिल में फ़िक्र-ओ-फ़न में था

अक़ील शादाब

सारे कुश्तों से जुदा ढंग इज़्तिराब-ए-दिल का है

अनवरी जहाँ बेगम हिजाब

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