दम Poetry (page 22)

खेल रचाया उस ने सारा वर्ना फिर क्यूँ होता मैं

साबिर वसीम

तुम्हारे आलम से मेरा आलम ज़रा अलग है

साबिर

जब कभी हादसात ने मारा

सबीहा सबा, पाकिस्तान

अजब सी बे-कली से चूर कोई

सबीहा सबा, पाकिस्तान

आँखों से वो कभी मिरी ओझल नहीं रहा

सअादत सईद

ये सिलसिला-ए-शाम-ओ-सहर यूँही नहीं है

रूही कंजाही

फिर कोई हादिसा हुआ ही नहीं

रूही कंजाही

गाए

रियाज़ लतीफ़

ये सीधे जो अब ज़ुल्फ़ों वाले हुए हैं

रियाज़ ख़ैराबादी

उतरी है आसमाँ से जो कल उठा तो ला

रियाज़ ख़ैराबादी

थी ज़र्फ़-ए-वज़ू में कोई शय पी गए क्या आप

रियाज़ ख़ैराबादी

रंग पर कल था अभी लाला-ए-गुलशन कैसा

रियाज़ ख़ैराबादी

पाया जो तुझे तो खो गए हम

रियाज़ ख़ैराबादी

पर्दे पर्दे में ये कर लेती हैं राहें क्यूँकर

रियाज़ ख़ैराबादी

मुझ को न दिल पसंद न दिल की ये ख़ू पसंद

रियाज़ ख़ैराबादी

मय रहे मीना रहे गर्दिश में पैमाना रहे

रियाज़ ख़ैराबादी

कल क़यामत है क़यामत के सिवा क्या होगा

रियाज़ ख़ैराबादी

जोबन उन का उठान पर कुछ है

रियाज़ ख़ैराबादी

जी उठे हश्र में फिर जी से गुज़रने वाले

रियाज़ ख़ैराबादी

इश्क़ में दिल-लगी सी रहती है

रियाज़ ख़ैराबादी

गुलों के पर्दे में शक्लें हैं मह-जबीनों की

रियाज़ ख़ैराबादी

दुनिया से अलग हम ने मयख़ाने का दर देखा

रियाज़ ख़ैराबादी

ज़माने में वो मह-लक़ा एक है

रिन्द लखनवी

यार आया है अहवाल-ए-दिल-ए-ज़ार दिखाओ

रिन्द लखनवी

तू आप को पोशीदा ओ इख़्फ़ा न समझना

रिन्द लखनवी

सदमे गुज़रे ईज़ा गुज़री

रिन्द लखनवी

मुँह न ढाँको अब तो सूरत देख ली

रिन्द लखनवी

जलन दिल की लिक्खें जो हम दिल-जले

रिन्द लखनवी

हैं ये सारे जीते-जी के वास्ते

रिन्द लखनवी

दिल-लगी ग़ैरों से बे-जा है मिरी जाँ छोड़ दे

रिन्द लखनवी

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