देख Poetry (page 69)

इश्क़ पर दाना नहीं मोहताज-ए-तहरीक-ए-जमाल

अनवरी जहाँ बेगम हिजाब

हुजूम शोला में था हल्क़ा-ए-शरर में था

अनवर सिद्दीक़ी

मुस्कुरा कर देख लेते हो मुझे

अनवर शऊर

टूटा तिलिस्म-ए-वक़्त तो क्या देखता हूँ मैं

अनवर शऊर

मुझे ये जुस्तुजू क्यूँ हो कि क्या हूँ और किया था मैं

अनवर शऊर

मैं अपने-आप से पीछा छुड़ा के

अनवर शऊर

ख़त्म हर अच्छा बुरा हो जाएगा

अनवर शऊर

जो जल उठी है शबिस्ताँ में याद सी क्या है

अनवर शऊर

इस में क्या शक है कि आवारा हूँ मैं

अनवर शऊर

बशारत हो कि अब मुझ सा कोई पागल न आएगा

अनवर शऊर

और न दर-ब-दर फिरा और न आज़मा मुझे

अनवर शऊर

पागलों की मद्ह में

अनवर सेन रॉय

अपने लिए एक नौहा

अनवर सेन रॉय

रंगीं बना के दामन-ए-ज़ख़्म-ए-जिगर को मैं

अनवर सहारनपुरी

जल्वे दिखाए यार ने अपनी हरीम-ए-नाज़ में

अनवर सहारनपुरी

आबाद अब न होगा मय-ख़ाना ज़िंदगी का

अनवर सहारनपुरी

तू जिस्म है तो मुझ से लिपट कर कलाम कर

अनवर सदीद

रहते हुए क़रीब जुदा हो गए हो तुम

अनवर साबरी

रुख़ से पर्दा उठा दे ज़रा साक़िया बस अभी रंग-ए-महफ़िल बदल जाएगा

अनवर मिर्ज़ापुरी

आइना देख ज़रा क्या मैं ग़लत कहता हूँ

अनवर मसूद

मैं देख भी न सका मेरे गिर्द क्या गया था

अनवर मसूद

इशारतों की वो शर्हें वो तज्ज़िया भी गया

अनवर मसूद

अब कहाँ और किसी चीज़ की जा रक्खी है

अनवर मसूद

छत पर बारिश बरस रही है

अनवर ख़ान

दर्द-ए-दिल की दवा है माह-ए-नौ

अनवर जमाल अनवर

किस सोच में हैं आइने को आप देख कर

अनवर देहलवी

हो रहा है टुकड़े टुकड़े दिल मेरे ग़म-ख़्वार का

अनवर देहलवी

है भी और फिर नज़र नहीं आती

अनवर देहलवी

आँखें दिखाईं ग़ैर को मेरी ख़ता के साथ

अनवर देहलवी

धूप हो गए साए जल गए शजर जैसे

अनवर अंजुम

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