दिल Poetry (page 229)

दिल के दामन में जो सरमाया-ए-अफ़्कार न था

गुहर खैराबादी

दर्द-ए-दिल के साथ क्या मेरे मसीहा कर दिया

गुहर खैराबादी

चराग़ से कभी तारों से रौशनी माँगे

गुहर खैराबादी

गया है कूचा-ए-काकुल में अब दिल

गोया फ़क़ीर मोहम्मद

उस को मुझ से रुठा दिया किस ने

गोया फ़क़ीर मोहम्मद

उस को ग़फ़लत-पेशा कह आते हैं हम

गोया फ़क़ीर मोहम्मद

उल्फ़त ये छुपाएँ हम किसी की

गोया फ़क़ीर मोहम्मद

क़त्ल उश्शाक़ किया करते हैं

गोया फ़क़ीर मोहम्मद

नीम बिस्मिल की क्या अदा है ये

गोया फ़क़ीर मोहम्मद

नज़्ज़ारा-ए-रुख़-ए-साक़ी से मुझ को मस्ती है

गोया फ़क़ीर मोहम्मद

क्यूँकर न ख़ुश हो सर मिरा लटक्का के दार में

गोया फ़क़ीर मोहम्मद

खोल दी है ज़ुल्फ़ किस ने फूल से रुख़्सार पर

गोया फ़क़ीर मोहम्मद

जो पिन्हाँ था वही हर सू अयाँ है

गोया फ़क़ीर मोहम्मद

हाथ से कुछ न तिरे ऐ मह-ए-कनआँ होगा

गोया फ़क़ीर मोहम्मद

हसरत ऐ जाँ शब-ए-जुदाई है

गोया फ़क़ीर मोहम्मद

दुआएँ माँगीं हैं मुद्दतों तक झुका के सर हाथ उठा उठा कर

गोया फ़क़ीर मोहम्मद

अपना हर उज़्व चश्म-ए-बीना है

गोया फ़क़ीर मोहम्मद

उल्फ़त का दर्द-ए-ग़म का परस्तार कौन है

गोविन्द गुलशन

शेर जब खुलता है खुलते हैं मआनी क्या क्या

गोविन्द गुलशन

शख़्सियत उस ने चमक-दार बना रक्खी है

गोविन्द गुलशन

सँभल के रहिएगा ग़ुस्से में चल रही है हवा

गोविन्द गुलशन

मुंतज़िर आँखें हैं मेरी शाम से

गोविन्द गुलशन

आप जब चेहरा बदल कर आ गए

गोविन्द गुलशन

तड़प तो आज भी कुछ कम नहीं है

गोर बचन सिंह दयाल मग़मूम

फिर मुझे जीने की दुआ दी है

गोर बचन सिंह दयाल मग़मूम

मिरी आह-ओ-फ़ुग़ाँ कुछ भी नहीं है

गोर बचन सिंह दयाल मग़मूम

जब मिली उन से नज़र मिटने का सामाँ हो गया

गोर बचन सिंह दयाल मग़मूम

गिला क्या करूँ ऐ फ़लक बता मिरे हक़ में जब ये जहाँ नहीं

गोर बचन सिंह दयाल मग़मूम

बात कुछ भी न थी फ़साना हुआ

गोर बचन सिंह दयाल मग़मूम

जितना कम सामान रहेगा

गोपालदास नीरज

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