दिल Poetry (page 84)

जाने वाले तुझे कब देख सकूँ बार-ए-दिगर

शाज़ तमकनत

छोड़ दूँ शहर तिरा छोड़ दूँ दुनिया तेरी

शाज़ तमकनत

बना हुस्न-ए-तकल्लुम हुस्न-ए-ज़न आहिस्ता आहिस्ता

शाज़ तमकनत

बड़े ख़ुलूस से दामन पसारता है कोई

शाज़ तमकनत

उर्दू ज़बान

शायर अली शायर

ज़माना याद रक्खेगा तुम्हें ये काम कर जाना

शायान क़ुरैशी

ज़बानें चुप रहें लेकिन मिज़ाज-ए-यार बोलेगा

शायान क़ुरैशी

शिकोह-ए-ज़ात से दुश्मन का लश्कर काँप जाता है

शायान क़ुरैशी

शाम के ढलते सूरज ने ये बात मुझे समझाई है

शायान क़ुरैशी

सब्र-ओ-क़रार टूट गया इज़्तिराब से

शायान क़ुरैशी

हज़ारों मुश्किलें हैं और लाखों ग़म लिए हैं हम

शायान क़ुरैशी

बिखरी थी हर सम्त जवानी रात घनेरी होने तक

शायान क़ुरैशी

बात हो दैर-ओ-हरम की या वतन की बात हो

शायान क़ुरैशी

हाथ उठाता हूँ मैं अब दुआ के लिए

शौक़ सालकी

आ कर नजात बख़्श दो रंज-ओ-मलाल से

शौक़ सालकी

वो ले के दिल को ये सोची कहीं जिगर भी है

शौक़ क़िदवाई

था बंद वो दर फिर भी मैं सौ बार गया था

शौक़ क़िदवाई

तेरी सी भी आफ़त कोई ऐ सोज़िश-ए-तब है

शौक़ क़िदवाई

रूह को आज नाज़ है अपना वक़ार देख कर

शौक़ क़िदवाई

रूह को आज नाज़ है अपना वक़ार देख कर

शौक़ क़िदवाई

मारे ग़ुस्से के ग़ज़ब की ताब रुख़्सारों में है

शौक़ क़िदवाई

लब चुप हैं तो क्या दिल गिला-पर्दाज़ नहीं है

शौक़ क़िदवाई

जफ़ा पे शुक्र का उम्मीद-वार क्यूँ आया

शौक़ क़िदवाई

हुई या मुझ से नफ़रत या कुछ इस में किब्र-ओ-नाज़ आया

शौक़ क़िदवाई

फ़रियाद और तुझ को सितमगर कहे बग़ैर

शौक़ क़िदवाई

दिल मिरा टूटा तो उस को कुछ मलाल आ ही गया

शौक़ क़िदवाई

भागे अच्छी शक्लों वाले इश्क़ है गोया काम बुरा

शौक़ क़िदवाई

अबरू है का'बा आज से ये नाम रख दिया

शौक़ क़िदवाई

कुछ तो देखें असर चराग़ चले

शौक़ माहरी

हसरत-ए-ज़ोहरा-वशाँ सर्व-क़दाँ है कि जो थी

शौक़ माहरी

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