दिल Poetry (page 83)
कौन से दिन तिरी याद ऐ बुत-ए-सफ़्फ़ाक नहीं
मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता
कब निगह उस की इश्वा-बार नहीं
मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता
जब रक़ीबों का सितम याद आया
मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता
इधर माइल कहाँ वो मह-जबीं है
मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता
गोर में याद-ए-क़द-ए-यार ने सोने न दिया
मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता
दिल लिया जिस ने बेवफ़ाई की
मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता
दस्त-ए-अदू से शब जो वो साग़र लिया किए
मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता
असर-ए-आह-ए-दिल-ए-ज़ार की अफ़्वाहें हैं
मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता
अब तो जिस रोज़ से रूठी है मोहब्बत उस की
शीश मोहम्मद इस्माईल आज़मी
मुझे मुआ'फ़ कर देना
शीरीं अहमद
दिल-ओ-निगाह के हुस्न-ओ-क़रार का मौसम
शाज़िया अकबर
अब तेरे इंतिज़ार की आदत नहीं रही
शाज़िया अकबर
अजनबी
शाज़ तमकनत
वो नियाज़-ओ-नाज़ के मरहले निगह-ओ-सुख़न से चले गए
शाज़ तमकनत
वो कौन है जिस की वहशत पर सुनते हैं कि जंगल रोता है
शाज़ तमकनत
वो गदा-गरान-ए-जल्वा सर-ए-रहगुज़ार चुप थे
शाज़ तमकनत
तिरी नज़र सबब-ए-तिश्नगी न बन जाए
शाज़ तमकनत
सुख़न राज़-ए-नशात-ओ-ग़म का पर्दा हो ही जाता है
शाज़ तमकनत
शब-ए-वा'दा कह गई है शब-ए-ग़म दराज़ रखना
शाज़ तमकनत
शब ओ रोज़ जैसे ठहर गए कोई नाज़ है न नियाज़ है
शाज़ तमकनत
सँभला नहीं दिल तुझ से बिछड़ कर कई दिन तक
शाज़ तमकनत
नफ़स नफ़स है तिरे ग़म से चूर चूर अब तक
शाज़ तमकनत
मेरी वहशत का तिरे शहर में चर्चा होगा
शाज़ तमकनत
मिरा ज़मीर बहुत है मुझे सज़ा के लिए
शाज़ तमकनत
मैं तो चुप था मगर उस ने भी सुनाने न दिया
शाज़ तमकनत
मैं लौट आऊँ कहीं तू ये सोचता ही न हो
शाज़ तमकनत
कोई तन्हाई का एहसास दिलाता है मुझे
शाज़ तमकनत
ख़्वाब नादिम हैं कि ता'बीर दिखाने से गए
शाज़ तमकनत
ख़ुद अपना हाल दिल-ए-मुब्तला से कुछ न कहा
शाज़ तमकनत
कौन देता रहा सहरा में सदा मेरी तरह
शाज़ तमकनत
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