दिल Poetry (page 81)

नीमचा यार ने जिस वक़्त बग़ल में मारा

ज़ौक़

निगह का वार था दिल पर फड़कने जान लगी

ज़ौक़

नाला इस शोर से क्यूँ मेरा दुहाई देता

ज़ौक़

नहीं सबात बुलंदी-ए-इज्ज़-ओ-शाँ के लिए

ज़ौक़

न खींचो आशिक़-तिश्ना-जिगर के तीर पहलू से

ज़ौक़

न करता ज़ब्त मैं नाला तो फिर ऐसा धुआँ होता

ज़ौक़

मिरे सीने से तेरा तीर जब ऐ जंग-जू निकला

ज़ौक़

मज़ा था हम को जो लैला से दू-ब-दू करते

ज़ौक़

मरज़-ए-इश्क़ जिसे हो उसे क्या याद रहे

ज़ौक़

मार कर तीर जो वो दिलबर-ए-जानी माँगे

ज़ौक़

महफ़िल में शोर-ए-क़ुलक़ुल-ए-मीना-ए-मुल हुआ

ज़ौक़

लेते ही दिल जो आशिक़-ए-दिल-सोज़ का चले

ज़ौक़

लाई हयात आए क़ज़ा ले चली चले

ज़ौक़

क्या ग़रज़ लाख ख़ुदाई में हों दौलत वाले

ज़ौक़

कोई इन तंग-दहानों से मोहब्बत न करे

ज़ौक़

किसी बेकस को ऐ बेदाद गर मारा तो क्या मारा

ज़ौक़

ख़त बढ़ा काकुल बढ़े ज़ुल्फ़ें बढ़ीं गेसू बढ़े

ज़ौक़

कल गए थे तुम जिसे बीमार-ए-हिज्राँ छोड़ कर

ज़ौक़

कहाँ तलक कहूँ साक़ी कि ला शराब तो दे

ज़ौक़

कब हक़-परस्त ज़ाहिद-ए-जन्नत-परस्त है

ज़ौक़

जुदा हों यार से हम और न हो रक़ीब जुदा

ज़ौक़

जो कुछ कि है दुनिया में वो इंसाँ के लिए है

ज़ौक़

जब चला वो मुझ को बिस्मिल ख़ूँ में ग़लताँ छोड़ कर

ज़ौक़

हुए क्यूँ उस पे आशिक़ हम अभी से

ज़ौक़

हाथ सीने पे मिरे रख के किधर देखते हो

ज़ौक़

हंगामा गर्म हस्ती-ए-ना-पाएदार का

ज़ौक़

गुहर को जौहरी सर्राफ़ ज़र को देखते हैं

ज़ौक़

गईं यारों से वो अगली मुलाक़ातों की सब रस्में

ज़ौक़

इक सदमा दर्द-ए-दिल से मिरी जान पर तो है

ज़ौक़

दूद-ए-दिल से है ये तारीकी मिरे ग़म-ख़ाना में

ज़ौक़

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