दिया Poetry (page 26)

हज़ार हैफ़ छुटा साथ हम-नशीनों का

शाद अज़ीमाबादी

ऐ बुत जफ़ा से अपनी लिया कर वफ़ा का काम

शाद अज़ीमाबादी

वो तो आईना-नुमा था मुझ को

शबनम शकील

उन की शर्मिंदा-ए-एहसान सी हो जाती है

शबनम शकील

सब तोड़ के बंधन दुनिया के मैं प्यार की जोत जगाऊँगी

शबनम शकील

हर रोज़ राह तकती हैं मेरे सिंघार की

शबनम शकील

हमराह मिरे कोई मुसाफ़िर न चला था

शबनम शकील

हमराह मिरे कोई मुसाफ़िर न चला था

शबनम शकील

चलती रहती है तसलसुल से जुनूँ-ख़ेज़ हवा

शबनम शकील

बदल चुकी है हर इक याद अपनी सूरत भी

शबनम शकील

तमाम उम्र की आवारगी पे भारी है

शबनम रूमानी

पी रहा है ज़िंदगी की धूप कितने प्यार से

शबनम नक़वी

नज़्म

शबनम अशाई

नज़्म

शबनम अशाई

नज़्म

शबनम अशाई

नज़्म

शबनम अशाई

नज़्म

शबनम अशाई

कभी भूल कर भी न बात की मुझे दिल से ऐसा भुला दिया

शबाब

सहरा की बे-आब ज़मीं पर एक चमन तय्यार किया

शायर लखनवी

वही इक फ़रेब हसरत कि था बख़्शिश-ए-निगाराँ

शानुल हक़ हक़्क़ी

जो हो वरा-ए-ज़ात वो जीना ही और है

शानुल हक़ हक़्क़ी

ऐ दिल तिरे ख़याल की दुनिया कहाँ से लाएँ

शानुल हक़ हक़्क़ी

वक़्त क्या शय है पता आप ही चल जाएगा

शाद आरफ़ी

हुदूद-ए-अक्ल-ओ-शर्ब का सवाल ही नहीं रहा

शाद आरफ़ी

वो दर्द है कि दर्द सरापा बना दिया

सेहर इश्क़ाबादी

पहली सी लज़्ज़तें नहीं अब दर्द-ए-इश्क़ में

सेहर इश्क़ाबादी

तकमील-ए-इश्क़ जब हो कि सहरा भी छोड़ दे

सेहर इश्क़ाबादी

तकमील-ए-इश्क़ जब हो कि सहरा भी छोड़ दे

सेहर इश्क़ाबादी

जिस से वफ़ा की थी उम्मीद उस ने अदा किया ये हक़

सेहर इश्क़ाबादी

दावर ने बंदे बंदों ने दावर बना दिया

सेहर इश्क़ाबादी

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