दुनिया Poetry (page 29)

शक्ल-ए-मिज़्गाँ न ख़ार की सी है

शाद लखनवी

हाथ से हाथ मिला दिल से तबीअ'त न मिली

शाद बिलगवी

तमन्नाओं में उलझाया गया हूँ

शाद अज़ीमाबादी

तमाम उम्र नमक-ख़्वार थे ज़मीं के हम

शाद अज़ीमाबादी

न जाँ-बाज़ों का मजमा था न मुश्ताक़ों का मेला था

शाद अज़ीमाबादी

कुछ कहे जाता था ग़र्क़ अपने ही अफ़्साने में था

शाद अज़ीमाबादी

हज़ार हैफ़ छुटा साथ हम-नशीनों का

शाद अज़ीमाबादी

वो तो आईना-नुमा था मुझ को

शबनम शकील

सामने इक बे-रहम हक़ीक़त नंगी हो कर नाचती है

शबनम शकील

सफ़र की आख़िरी मंज़िल के राहबर हम हैं

शबनम शकील

सब तोड़ के बंधन दुनिया के मैं प्यार की जोत जगाऊँगी

शबनम शकील

न पूछ देख के कितना मलाल होता है

शबनम शकील

हाथ न आई दुनिया भी और इश्क़ में भी गुमनाम रहे

शबनम शकील

हम-नशीनो कुछ नहीं रक्खा यहाँ पर कुछ नहीं

शबनम शकील

हैं मनाज़िर सब बहम-पर्दा नज़र बाक़ी नहीं

शबनम शकील

इक बे-नाम सी खोज है दिल को जिस के असर में रहते हैं

शबनम शकील

आईन-ए-वफ़ा इतना भी सादा नहीं होता

शबनम शकील

तेरी ताबिश से रौशन हैं गुल भी और वीराने भी

शबनम रूमानी

यही सुलूक मुनासिब है ख़ुश-गुमानों से

शबनम रूमानी

मेरे प्यार का क़िस्सा तो हर बस्ती में मशहूर है चाँद

शबनम रूमानी

लम्हों का पथराव है मुझ पर सदियों की यलग़ार

शबनम रूमानी

तब्सिरा यूँ न मिरे हाल पे इतना होता

शबनम नक़वी

नज़्म

शबनम अशाई

नज़्म

शबनम अशाई

नज़्म

शबनम अशाई

नज़्म

शबनम अशाई

इतना एहसान और करता कौन

शबी फ़ारूक़ी

बहुत कुछ लिखा है बहुत कुछ लिखेंगे

शब्बीर नकिद

आँसू शो'लों में ढल रहे हैं

शायर लखनवी

पाई न कोई मंज़िल पहुँचीं न कहीं राहें

शानुल हक़ हक़्क़ी

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