दुनिया Poetry (page 42)

वक़्त ख़ुश-ख़ुश काटने का मशवरा देते हुए

रियाज़ मजीद

सत्‌ह-बीं थे सब, रहे बाहर की काई देखते

रियाज़ मजीद

निशान क़ाफ़ला-दर-क़ाफ़ला रहेगा मिरा

रियाज़ मजीद

बदल सका न जुदाई के ग़म उठा कर भी

रियाज़ मजीद

ख़ुदा से उसे माँग कर देखते हैं

रेनू नय्यर

ख़ुदा से उसे माँग कर देखते हैं

रेनू नय्यर

शहर-बानो के लिए एक नज़्म

रहमान फ़ारिस

उम्र-भर इश्क़ किसी तौर न कम हो आमीन

रहमान फ़ारिस

मैं कार-आमद हूँ या बे-कार हूँ मैं

रहमान फ़ारिस

हसीन दुनिया उजड़ गई तो

रेहान अल्वी

ताज़ियत की खोखली है रस्म जारी आज-कल

रेहान अल्वी

हर आने वाले पल से डर रहा हूँ

रज़्ज़ाक़ अरशद

शहर अपना है मगर लोग कहाँ हैं अपने

रज़्ज़ाक़ अफ़सर

दिल के दर्द के कम होने का तन्हा कुछ सामान हुआ

रज़िया फ़सीह अहमद

बयाबाँ हो कि सहरा हो मुझे तेरा सहारा हो

रज़िया हलीम जंग

शब का सफ़र

रज़ी रज़ीउद्दीन

शब ज़रा देर से गुज़रेगी न घबरा ऐ दिल

रज़ी रज़ीउद्दीन

अपने मेहवर से जब उतर जाऊँ

रज़ी रज़ीउद्दीन

ख़ुद-निगर थे और महव-ए-दीद-ए-हुस्न-ए-यार थे

रज़ी मुजतबा

शायद अब रूदाद-ए-हुनर में ऐसे बाब लिखे जाएँगे

राज़ी अख्तर शौक़

मैं जब भी क़त्ल हो कर देखता हूँ

राज़ी अख्तर शौक़

ख़्वाबों की इक भीड़ लगी है जिस्म बेचारा नींद में है

राज़ी अख्तर शौक़

जिस पल मैं ने घर की इमारत ख़्वाब-आसार बनाई थी

राज़ी अख्तर शौक़

जिस ने बनाया हर आईना मैं ही था

राज़ी अख्तर शौक़

जभी तो ज़ख़्म भी गहरा नहीं है

राज़ी अख्तर शौक़

दो बादल आपस में मिले थे फिर ऐसी बरसात हुई

राज़ी अख्तर शौक़

दिन का मलाल शाम की वहशत कहाँ से लाएँ

राज़ी अख्तर शौक़

आवार्गान-ए-शौक़ सभी घर के हो गए

राज़ी अख्तर शौक़

ज़िंदगी अब इस क़दर सफ़्फ़ाक हो जाएगी क्या

रज़ा मौरान्वी

हुस्न की फ़ितरत में दिल-आज़ारियाँ

रज़ा लखनवी

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