दुनिया Poetry (page 41)

गुलशन की फ़क़त फूलों से नहीं काँटों से भी ज़ीनत होती है

सबा अफ़ग़ानी

गुलशन की फ़क़त फूलों से नहीं काँटों से भी ज़ीनत होती है

सबा अफ़ग़ानी

हमें कहती है दुनिया ज़ख़्म-ए-दिल ज़ख़्म-ए-जिगर वाले

साइल देहलवी

ये जमाल क्या ये जलाल क्या ये उरूज क्या ये ज़वाल क्या

सादुल्लाह शाह

अब्र उतरा है चार-सू देखो

सादुल्लाह शाह

तिलिस्म-ए-नश्शा-ए-दुनिया भी आज ख़त्म हुआ

रोहित सोनी ‘ताबिश’

यहीं पर ख़त्म होनी चाहिए थी एक दुनिया

रियाज़ लतीफ़

वीरान ख़्वाहिश

रियाज़ लतीफ़

एक रोते हुए आदमी को देख कर

रियाज़ लतीफ़

मैं वहाँ हूँ कि नहीं चाहे तो जा कर देखे

रियाज़ लतीफ़

किसी बे-घर जहाँ का राज़ होना चाहिए था

रियाज़ लतीफ़

जिस्मों की मेहराब में रहना पड़ता है

रियाज़ लतीफ़

ख़ुदा आबाद रक्खे मय-कदे को

रियाज़ ख़ैराबादी

बच जाए जवानी में जो दुनिया की हवा से

रियाज़ ख़ैराबादी

ये काफ़िर बुत जिन्हें दावा है दुनिया में ख़ुदाई का

रियाज़ ख़ैराबादी

वो कौन है दुनिया में जिसे ग़म नहीं होता

रियाज़ ख़ैराबादी

परा बाँधे सफ़-ए-मिज़्गाँ खड़ी है

रियाज़ ख़ैराबादी

ग़रीब हम हैं ग़रीबों की भी ख़ुशी हो जाए

रियाज़ ख़ैराबादी

दर्द हो तो दवा करे कोई

रियाज़ ख़ैराबादी

तू आप को पोशीदा ओ इख़्फ़ा न समझना

रिन्द लखनवी

साइलाना उन के दर पर जब मिरा जाना हुआ

रिन्द लखनवी

सदमे गुज़रे ईज़ा गुज़री

रिन्द लखनवी

अदू ग़ैर ने तुझ को दिलबर बनाया

रिन्द लखनवी

हुए जब से मोहब्बत-आश्ना हम

रिफ़अत सुलतान

यूँही गर लुत्फ़ तुम लेते रहोगे ख़ूँ बहाने में

रिफ़अत सेठी

मोहब्बत में वफ़ा वालों को कब ईज़ा सताती है

रिफ़अत सेठी

न कोई दोस्त न दुश्मन अजीब दुनिया है

रिफ़अत सरोश

हंगामे से वहशत होती है तन्हाई में जी घबराए है

रिफ़अत सरोश

गली गली मिरी वहशत लिए फिरे है मुझे

रिफ़अत सरोश

इसी हुजूम में लड़-भिड़ के ज़िंदगी कर लो

रियाज़ मजीद

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