इकाई Poetry (page 11)

कलियों की महक होता तारों की ज़िया होता

साग़र सिद्दीक़ी

सावन की रुत आ पहुँची काले बादल छाएँगे

साग़र निज़ामी

आँख तुम्हारी मस्त भी है और मस्ती का पैमाना भी

साग़र निज़ामी

नज़्म

सफ़िया अरीब

मैं दोस्त से न किसी दुश्मनी से डरता हूँ

सईद नक़वी

हो गई सारी पशेमानी अबस

सबा जायसी

टुकड़े हुए थे दामन-ए-हस्ती के जिस क़दर

सबा अकबराबादी

उलझनों में कैसे इत्मीनान-ए-दिल पैदा करें

सबा अकबराबादी

ज़ालिम पे अज़ाब हो गया हूँ

रूही कंजाही

साबुन

रियाज़ लतीफ़

एक रोते हुए आदमी को देख कर

रियाज़ लतीफ़

वो हों मुट्ठी में उन की दिल हो हम हों

रियाज़ ख़ैराबादी

मुँह दिखा कर मुँह छुपाना कुछ नहीं

रियाज़ ख़ैराबादी

वक़ार-ए-शाह-ए-ज़विल-इक्तदार देख चुके

रिन्द लखनवी

सातों फ़लक किए तह-ओ-बाला निकल गया

रिन्द लखनवी

क़ब्र पर होवें दो न चार दरख़्त

रिन्द लखनवी

नीस्त बे-यार मुझ को हस्ती है

रिन्द लखनवी

मुँह न ढाँको अब तो सूरत देख ली

रिन्द लखनवी

जलन दिल की लिक्खें जो हम दिल-जले

रिन्द लखनवी

एक बे-रंग से ग़ुबार में हूँ

रिफ़अत सरोश

बुढ़ापा

रज़ी रज़ीउद्दीन

दस्तक सी ये क्या थी कोई साया है कि मैं हूँ

राज़ी अख्तर शौक़

ज़िंदगी अब इस क़दर सफ़्फ़ाक हो जाएगी क्या

रज़ा मौरान्वी

मकीं और भी हैं मकाँ और भी हैं

रज़ा जौनपुरी

हूँ शामिल सब में और सब से जुदा हूँ

रज़ा अमरोही

रंग उस महफ़िल-ए-तमकीं में जमाया न गया

रविश सिद्दीक़ी

रंग पर जब वो बज़्म-ए-नाज़ आई

रविश सिद्दीक़ी

नक़ाब-ए-शब में छुप कर किस की याद आई समझते हैं

रविश सिद्दीक़ी

कौन कहता मुझे शाइस्ता-ए-तहज़ीब-ए-जुनूँ

रविश सिद्दीक़ी

न बुतों के न अब ख़ुदा के रहे

रौनक़ टोंकवी

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