जाओ Poetry (page 8)

मरज़-ए-इश्क़ जिसे हो उसे क्या याद रहे

ज़ौक़

हुए क्यूँ उस पे आशिक़ हम अभी से

ज़ौक़

चुपके चुपके ग़म का खाना कोई हम से सीख जाए

ज़ौक़

आसमाँ तुझ से किनारा कहीं करना है मुझे

शहज़ाद रज़ा लम्स

होगी इस ढेर इमारत की कहानी कुछ तो

शहपर रसूल

ज़माना याद रक्खेगा तुम्हें ये काम कर जाना

शायान क़ुरैशी

ज़बानें चुप रहें लेकिन मिज़ाज-ए-यार बोलेगा

शायान क़ुरैशी

शाम के ढलते सूरज ने ये बात मुझे समझाई है

शायान क़ुरैशी

इबादत के वक़्त में हिस्सा

शारिक़ कैफ़ी

सूना आँगन नींद में ऐसे चौंक उठा है

शारिक़ कैफ़ी

हवा की राह-नुमाई पे शक नहीं रखते

शरीक़ अदील

ख़ंदा-ए-मौज मिरी तिश्ना-लबी ने जाना

शरीफ़ कुंजाही

अब किसी शाख़ पे हिलता नहीं पत्ता कोई

शरीफ़ कुंजाही

जो आँसुओं की ज़बाँ को मियाँ समझने लगे

शारिब मौरान्वी

शोर थमने के बाद

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

वजूद-ए-बर्क़ ज़रूरी है गुलिस्ताँ के लिए

शम्स इटावी

ख़लिश हो जिस में वो अरमाँ तलाश करता हूँ

शम्स इटावी

रखना है तो फूलों को तू रख ले निगाहों में

शमीम करहानी

आना उसी का बज़्म से जाना उसी का है

शमीम हनफ़ी

हासिल-ए-उम्र है जो एक कसक बाक़ी है

शकील जाज़िब

थोड़ा सा माहौल बनाना होता है

शकील जमाली

सफ़र से लौट जाना चाहता है

शकील जमाली

रूह से कब ये जिस्म जुदा है

शकील ग्वालिआरी

चाक कर कर के गरेबाँ रोज़ सीना चाहिए

शकील ग्वालिआरी

तस्वीर बनाता हूँ तिरी ख़ून-ए-जिगर से

शकील बदायुनी

ख़िरद को आज़माना चाहता हूँ

शकील बदायुनी

कैसे कह दूँ की मुलाक़ात नहीं होती है

शकील बदायुनी

कच्चे रंगों का मौसम

शकील आज़मी

ज़रा से ग़म के लिए जान से गुज़र जाना

शकील आज़मी

धुआँ धुआँ है फ़ज़ा रौशनी बहुत कम है

शकील आज़मी

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