खार Poetry (page 14)

ज़ौक़-ए-उल्फ़त अब भी है राहत का अरमाँ अब भी है

बशीरुद्दीन अहमद देहलवी

अब के जुनूँ में लज़्ज़त-ए-आज़ार भी नहीं

बशीर फ़ारूक़ी

जल्वों का उन के दिल को तलब-गार कर दिया

बशीरुद्दीन राज़

ज़ख़्म खा के ख़ंदाँ हैं पैरहन-दरीदा हम

बशीर मुंज़िर

हर गाम पे आवारगी-ओ-दर-ब-दरी में

बशीर अहमद बशीर

क्यूँ सबा की न हो रफ़्तार ग़लत

बाक़ी सिद्दीक़ी

सामने सब के न बोलेंगे हमारा क्या है

बाक़ी अहमदपुरी

मेरा जनम दिन

बाक़र मेहदी

तबाह हो के भी इक अपनी आन बाक़ी है

बाक़र मेहदी

बदल के रख देंगे ये तसव्वुर कि आदमी का वक़ार क्या है

बाक़र मेहदी

रहता है ज़ुल्फ़-ए-यार मिरे मन से मन लगा

बाक़र आगाह वेलोरी

क्यूँ कर न ऐसे जीने से या रब मलूल हूँ

बाक़र आगाह वेलोरी

सब रंग में उस गुल की मिरे शान है मौजूद

ज़फ़र

गई यक-ब-यक जो हवा पलट नहीं दिल को मेरे क़रार है

ज़फ़र

वही दाग़-ए-लाला की बात है कि ब-नाम-ए-हुस्न उधर गई

अज़ीज़ हामिद मदनी

तल्ख़-तर और ज़रा बादा-ए-साफ़ी साक़ी

अज़ीज़ हामिद मदनी

हवा आशुफ़्ता-तर रखती है हम आशुफ़्ता-हालों को

अज़ीज़ हामिद मदनी

जैसे कोई रोता है गले प्यार से लग कर

अज़ीज़ एजाज़

फूल जो दिल की रहगुज़र में है

अज़ीज़ अन्सारी

ये फूल जो मिट्टी के हयूलों से अटा है

अज़ीम कुरेशी

लाई न सबा बू-ए-चमन अब के बरस भी

अज़ीम मुर्तज़ा

ज़ब्त करना न कभी ज़ब्त में वहशत करना

अय्यूब ख़ावर

उश्शाक़ बहुत हैं तिरे बीमार बहुत हैं

अय्यूब ख़ावर

कितना मुश्किल है

अतीक़ुल्लाह

तिफ़्ली के ख़्वाब

असरार-उल-हक़ मजाज़

नौ-जवान से

असरार-उल-हक़ मजाज़

ए'तिराफ़

असरार-उल-हक़ मजाज़

आज की रात

असरार-उल-हक़ मजाज़

आज भी

असरार-उल-हक़ मजाज़

आहंग-ए-नौ

असरार-उल-हक़ मजाज़

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