धूल Poetry (page 21)

क्यूँ मुश्त-ए-ख़ाक पर कोई दिल दाग़दार हो

शाह दीन हुमायूँ

कोई दम थमता नहीं बारान-ए-अश्क

शाह आसिम

चर्चे हर इक ज़बान पे हुस्न-ए-बुताँ के हैं

शाग़िल क़ादरी

बला जाने किसी की हिज्र में इस दिल पे क्या गुज़री

शाग़िल क़ादरी

शक़ आफ़ियत-कनार किनारे को कर गई

शफ़क़त तनवीर मिर्ज़ा

हम ने तो यही मा'रका मारा है सफ़र में

शफ़क़त तनवीर मिर्ज़ा

ख़ल्क़-ए-ख़ुदा है शाह की मुख़्बर लगी हुई

शफ़ीक़ सलीमी

हम ज़मीन-ज़ादों को आसमाँ बना जाना

शफ़ीक़ सलीमी

अब जा कर एहसास हुआ है प्यार भी करना था

शफ़ीक़ सलीमी

पर्दा पड़ा हुआ था ख़ुदी ने उठा दिया

शफ़ीक़ जौनपुरी

कोई टूटी हुई कश्ती का तख़्ता भी अगर है ला

शफ़ीक़ जौनपुरी

कली पर मुस्कुराहट आज भी मालूम होती है

शफ़ीक़ जौनपुरी

कब से इस दुनिया को सरगर्म-ए-सफ़र पाता हूँ मैं

शफ़ीक़ जौनपुरी

ये क्या कि मेरे यक़ीं में ज़रा गुमाँ भी है

शफ़क़ सुपुरी

कहीं कुछ और भी है ख़्वाहिश-ए-दिगर के बा'द

शफ़क़ सुपुरी

चमन की ख़ाक पे मौज-ए-बला ने रक़्स किया

शफ़क़ सुपुरी

आँखों से मअ'नी-ए-सुख़न-ए-मीर देखते

शफ़क़ सुपुरी

गुल-ए-ख़ुश-नुमा के लिबास में कि शुआ-ए-नूर में ढल के आ

शायर फतहपुरी

ज़रा देखना ख़ाकसारी हमारी

शाद लखनवी

वो मय-परस्त हूँ बदली न जब नज़र आई

शाद लखनवी

टूटे जो दाँत मुँह की शबाहत बिगड़ गई

शाद लखनवी

तस्वीर मिरी है अक्स तिरा तू और नहीं मैं और नहीं

शाद लखनवी

सुना हम को आते जो अंदर से बाहर

शाद लखनवी

शर्तें जो बंदगी में लगाना रवा हुआ

शाद लखनवी

शगुफ़्ता होते ही मुरझा गई कली अफ़सोस

शाद लखनवी

क़ौल उस दरोग़-गो का कोई भी सच हुआ है

शाद लखनवी

ख़ुदा ही उस चुप की दाद देगा कि तुर्बतें रौंदे डालते हैं

शाद लखनवी

कहते हैं नाला-ए-हज़ीं सुन के

शाद लखनवी

जो मुर्ग़-ए-क़िबला-नुमा बन के आशियाँ से चले

शाद लखनवी

जी जाऊँ जो बंद नातिक़ा हो

शाद लखनवी

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