खाली Poetry (page 5)

हवा बातों की जो चलने लगी है

स्वप्निल तिवारी

आईना देखना

सूरज नारायण मेहर

ये जो हम अतलस ओ किम-ख़्वाब लिए फिरते हैं

सुल्तान अख़्तर

इरफ़ान

सुलैमान अरीब

ज़र्द-चमेली

सूफ़िया अनजुम ताज

हुस्न का दामन फिर भी ख़ाली

सूफ़ी तबस्सुम

किस ने ग़म के जाल बिखेरे

सूफ़ी तबस्सुम

जान दे कर वफ़ा में नाम किया

सूफ़ी तबस्सुम

अब न कुछ सुनना न सुनाना रात गुज़रती जाती है

सिराज लखनवी

मरहले सख़्त बहुत पेश-ए-नज़र भी आए

सिराज अजमली

ख़ुद-कुशी करने का अगला मंसूबा

सिदरा सहर इमरान

लकड़ी की दो मेज़ें हैं इक लोहे की अलमारी है

सिदरा सहर इमरान

असबाब-ए-हस्त रह में लुटाना पड़ा मुझे

सिदरा सहर इमरान

सहर को धुँद का ख़ेमा जला था

सिद्दीक़ अफ़ग़ानी

दिन के पास कहाँ जो हम रातों में माल बनाते हैं

शुजा ख़ावर

छोड़िए बाक़ी भी क्या रक्खा है उन के क़हर में

शुजा ख़ावर

बस अपनी ख़ाक पर अब ख़ुद ही सुल्तानी करेंगे हम

शोएब निज़ाम

हाए क्या हाल कर लिया दिल का

शमशाद शाद

दुश्मनी वो लाए हैं दोस्ती के दामन में

शिफ़ा कजगावन्वी

तीस दिन के लिए तर्क-ए-मय-ओ-साक़ी कर लूँ

शिबली नोमानी

देखो फ़िराक़-ए-यार में जाँ खो रहा है वो

शहज़ाद रज़ा लम्स

मोम की गुड़िया

शीरीं अहमद

जाने क्या क़ीमत-ए-अरबाब-ए-वफ़ा ठहरेगी

शाज़ तमकनत

ज़ुल्फ़-ए-दराज़ से ये नुमायाँ है ग़ालिबन

शौक़ बहराइची

अक़्ल की कुछ कम नहीं है रहबरी मेरे लिए

शौक़ बहराइची

जन्नत से दूर

शारिक़ कैफ़ी

इबादत के वक़्त में हिस्सा

शारिक़ कैफ़ी

अजब मुश्किल है मेरी

शारिक़ कैफ़ी

सूना आँगन नींद में ऐसे चौंक उठा है

शारिक़ कैफ़ी

लोग सह लेते थे हँस कर कभी बे-ज़ारी भी

शारिक़ कैफ़ी

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