सपना Poetry (page 42)

नया अदम कोई नई हदों का इंतिख़ाब अब

रियाज़ लतीफ़

जिस्मों की मेहराब में रहना पड़ता है

रियाज़ लतीफ़

हर एक ख़लिया को आईना घर बनाते हुए

रियाज़ लतीफ़

गुज़र चुके हैं बदन से आगे नजात का ख़्वाब हम हुए हैं

रियाज़ लतीफ़

दुनिया से परे जिस्म के इस बाब में आए

रियाज़ लतीफ़

ज़ेर-ए-मस्जिद मय-कदा में मय-कदे में मस्त-ए-ख़्वाब

रियाज़ ख़ैराबादी

ये सर-ब-मोहर बोतलें हैं जो शराब की

रियाज़ ख़ैराबादी

'रियाज़' इक चुलबुला सा दिल हो हम हों

रियाज़ ख़ैराबादी

मेरे पहलू में हमेशा रही सूरत अच्छी

रियाज़ ख़ैराबादी

जी उठे हश्र में फिर जी से गुज़रने वाले

रियाज़ ख़ैराबादी

क्यूँ-कर न लाए रंग गुलिस्ताँ नए नए

रिन्द लखनवी

पहली बरसात की घटा छाई

रिफ़अत अल हुसैनी

इन्ही सुब्हों में वो इक सुब्ह-ए-नवा याद करो

रिफ़अत अब्बास

हम फ़लक के आदमी थे साकिनान-ए-क़र्या-ए-महताब थे

रियाज़ मजीद

आँच आएगी न अंदर की ज़बाँ तक ऐ दिल

रियाज़ मजीद

धूप को कुछ और जलना चाहिए

रेनू नय्यर

धूप को कुछ और जलना चाहिए

रेनू नय्यर

जागती आँखों का ख़्वाब

रहमान फ़ारिस

मुझे ग़रज़ है सितारे न माहताब के साथ

रहमान फ़ारिस

हर दिसम्बर इसी वहशत में गुज़ारा कि कहीं

रेहाना रूही

वो मुंतज़िर हैं हमारे तो हम किसी के हैं

रेहाना रूही

शब-ओ-रोज़ रक़्स-ए-विसाल था सो नहीं रहा

रेहाना रूही

नींद आँखों में मुसलसल नहीं होने देता

रेहाना रूही

नज़्ज़ारा-ए-जमाल ने सोने नहीं दिया

रेहाना रूही

किसी की चश्म-ए-गुरेज़ाँ में जल बुझे हम लोग

रेहाना रूही

दिल को रह रह के ये अंदेशे डराने लग जाएँ

रेहाना रूही

तुम अँधियारों की बात करो

रेहान अल्वी

दिल तो है एक मगर दर्द के ख़ाने हैं बहुत

रज़िया फ़सीह अहमद

सौ रहा था तो शोर बरपा था

रज़ी तिर्मिज़ी

ख़्वाब-फ़रोश

रज़ी रज़ीउद्दीन

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