दृश्य Poetry (page 15)

सूरज ज़मीं की कोख से बाहर भी आएगा

सलीम शाहिद

क़ाइल करूँ किस बात से मैं तुझ को सितमगर

सलीम शाहिद

मिरी थकन मिरे क़स्द-ए-सफ़र से ज़ाहिर है

सलीम शाहिद

इन दर-ओ-दीवार की आँखों से पट्टी खोल कर

सलीम शाहिद

दर्द की ख़ुश्बू से सारा घर मोअ'त्तर हो गया

सलीम शाहिद

तू दरिया है और ठहरने वाला मैं

सलीम मुहीउद्दीन

मुलाक़ातों का ऐसा सिलसिला रक्खा है तुम ने

सलीम कौसर

इस आलम-ए-हैरत-ओ-इबरत में कुछ भी तो सराब नहीं होता

सलीम कौसर

आख़िरी पड़ाव

सलीम फ़िगार

कहीं आँखें कहीं बाज़ू कहीं से सर निकल आए

सलीम फ़िगार

ख़ुद अपने अक्स को हैरत से देखता हूँ मैं

सलीम बेताब

जी में आता है कि इक रोज़ ये मंज़र देखें

सलीम बेताब

मुझे इन आते जाते मौसमों से डर नहीं लगता

सलीम अहमद

कुछ हैं मंज़र हाल के कुछ ख़्वाब मुस्तक़बिल के हैं

सलीम अहमद

ख़ैर का तुझ को यक़ीं है और उस को शर का है

सलीम अहमद

हर आँख का हासिल दूरी है

सलीम अहमद

देखने के लिए इक शर्त है मंज़र होना

सलीम अहमद

बज़्म आख़िर हुई शम्ओं' का धुआँ बाक़ी है

सलीम अहमद

तसलसुल

सलाम मछली शहरी

सड़क बन रही है

सलाम मछली शहरी

इन ग़ज़ालान-ए-तरह-दार को कैसे छोड़ूँ

सलाम मछली शहरी

आरज़ूओं का हसीं पैकर तराश

सज्जाद सय्यद

रात

सज्जाद बाक़र रिज़वी

ज़हर इन के हैं मिरे देखे हुए भाले हुए

सज्जाद बाक़र रिज़वी

जुर्म-ए-इज़हार-ए-तमन्ना आँख के सर आ गया

सज्जाद बाक़र रिज़वी

मी-यौमिल-हिसाब

साजिदा ज़ैदी

वफ़ा-ओ-मेहर-ओ-अल्ताफ़-ओ-करम थे हम-इनाँ क्या क्या

साजिदा ज़ैदी

रंग बिरंगे सपनों जैसी आँखें तेरी

साजिद हमीद

आरज़ूएँ सब ख़ाक हुईं

साजिद हमीद

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साइमा असमा

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