दृश्य Poetry (page 42)

हश्र की सुब्ह दरख़्शाँ हो मक़ाम-ए-महमूद

आदिल मंसूरी

आँसू

अदील ज़ैदी

क़र्ज़-ए-जाँ से निमट रही है हयात

अदील ज़ैदी

आगे हरीम-ए-ग़म से कोई रास्ता न था

अदा जाफ़री

वो कश्ती से देते थे मंज़र की दाद

अबुल हसनात हक़्क़ी

ये इक और हम ने क़रीना किया

अबुल हसनात हक़्क़ी

ये इक और हम ने क़रीना किया

अबुल हसनात हक़्क़ी

दिल को हम दरिया कहें मंज़र-निगारी और क्या

अबुल हसनात हक़्क़ी

बे-रब्ती-ए-हयात का मंज़र भी देख ले

अबु मोहम्मद सहर

सब इक न इक सराब के चक्कर में रह गए

अबु मोहम्मद सहर

वक़्त-ए-रुख़्सत भीगती पलकों का मंज़र याद है

अबसार अब्दुल अली

जो नहीं लगती थी कल तक अब वही अच्छी लगी

अबसार अब्दुल अली

हम कि इक भेस लिए फिरते हैं

अबरार अहमद

राह दुश्वार भी है बे-सर-ओ-सामानी भी

अबरार अहमद

जो भी यकजा है बिखरता नज़र आता है मुझे

अबरार अहमद

कोई मंज़र भी नहीं अच्छा लगा

आबिद वदूद

जब से दरिया में है तुग़्यानी बहुत

आबिद वदूद

जब आसमान पर मह-ओ-अख़्तर पलट कर आए

आबिद मुनावरी

एक भी चैन का बिस्तर नहीं होने देता

अब्दुस्समद ’तपिश’

अच्छा है कोई तीर-बा-नश्तर भी ले चलो

अब्दुल्लतीफ़ शौक़

अपने होने का इक इक पल तजरबा करते रहे

अब्दुल्लाह कमाल

मंज़रों के भी परे हैं मंज़र

अब्दुल्लाह जावेद

कभी प्यारा कोई मंज़र लगेगा

अब्दुल्लाह जावेद

जो गुज़रता है गुज़र जाए जी

अब्दुल्लाह जावेद

चाँदनी का रक़्स दरिया पर नहीं देखा गया

अब्दुल्लाह जावेद

इंतिशार-ओ-ख़ौफ़ हर इक सर में है

अब्दुल मतीन नियाज़

होंकते दश्त में इक ग़म का समुंदर देखो

अब्दुल हफ़ीज़ नईमी

प्यास बुझ जाए ज़मीं सब्ज़ हो मंज़र धुल जाए

अब्दुल अहद साज़

पस-मंज़र में 'फ़ीड' हुए जाते हैं इंसानी किरदार

अब्दुल अहद साज़

बम्बई की एक पुरानी शाम

अब्दुल अहद साज़

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