दृश्य Poetry (page 41)

मा-बा'द-उत-तबीआत

अहमद हमेश

हमेशा के लिए मुझ से बिछड़ जा

अहमद फ़राज़

पहली आवाज़

अहमद फ़राज़

ये आलम शौक़ का देखा न जाए

अहमद फ़राज़

उस मंज़र-ए-सादा में कई जाल बंधे थे

अहमद फ़राज़

सब क़रीने उसी दिलदार के रख देते हैं

अहमद फ़राज़

ख़ुद को तिरे मेआर से घट कर नहीं देखा

अहमद फ़राज़

वक़्त के हर इक नक़्श का मअ'नी इतना बदला बदला होगा

अहमद फ़क़ीह

किसे ख़बर कि है क्या क्या ये जान थामे हुए

अहमद अज़ीम

दस्तक हवा की सुन के कभी डर नहीं गया

अहमद अज़ीम

हिंसा के पहले मुझे फिर रुला गया इक शख़्स

अहमद अली बर्क़ी आज़मी

दूर से क्या मुस्कुरा कर देखना

आग़ाज़ बरनी

ख़ाली हुआ गिलास नशा सर में आ गया

अफ़ज़ाल नवेद

कर्ब के शहर से निकले तो ये मंज़र देखा

अफ़ज़ल मिनहास

काँच की ज़ंजीर टूटी तो सदा भी आएगी

अफ़ज़ल मिनहास

मैं ख़ुद को इस लिए मंज़र पे लाने वाला नहीं

अफ़ज़ल गौहर राव

आख़िरी दलील

अफ़ज़ाल अहमद सय्यद

ये जो ठहरा हुआ मंज़र है बदलता ही नहीं

आफ़ताब इक़बाल शमीम

हर किसी का हर किसी से राब्ता टूटा हुआ

आफ़ताब इक़बाल शमीम

एक मंज़र है कि आँखों से सरकता ही नहीं

आफ़ताब हुसैन

क़दम क़दम पे किसी इम्तिहाँ की ज़द में है

आफ़ताब हुसैन

जब सफ़र से लौट कर आने की तय्यारी हुई

आफ़ताब हुसैन

मुझ को मंज़र के सिले में वो सदा भेजता है

आफ़ताब अहमद शाह

ये रेग-ए-रवाँ याद-दहानी तो नहीं क्या

आफ़ताब अहमद

तलाश

अफ़रोज़ आलम

जगा जुनूँ को ज़रा नक़्शा-ए-मुक़द्दर खींच

अफ़रोज़ आलम

जगा जुनूँ को ज़रा नक़्शा-ए-मुक़द्दर खींच

अफ़रोज़ आलम

ऐ दोस्त तिरी बात सहर-ख़ेज़ बहुत है

अफ़रोज़ आलम

हम अहल-ए-नज़ारा शाम-ओ-सहर आँखों को फ़िदया करते हैं

अफ़ीफ़ सिराज

नज़्म

आदिल मंसूरी

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