दृश्य Poetry (page 14)

यक-ब-यक मंज़र-ए-हस्ती का नया हो जाना

सरवत हुसैन

वो मेरे सामने मल्बूस क्या बदलने लगा

सरवत हुसैन

पहनाए-बर-ओ-बहर के महशर से निकल कर

सरवत हुसैन

सर झुका लेता था पहले जिस को अक्सर देख कर

सरमद सहबाई

मिल-जुल कर ईमान ख़ुदा पर ला सकते हैं

सरफ़राज़ ज़ाहिद

ख़्वाब में मंज़र रह जाता है

सरफ़राज़ ज़ाहिद

दो आँखों से कम से कम इक मंज़र में

सरफ़राज़ ज़ाहिद

आईना चुपके से मंज़र वो चुरा लेता है

सरफ़राज़ नवाज़

तिरे ख़ुलूस के क़िस्से सुना रहा हूँ मैं

सरफ़राज़ नवाज़

एक रस्ते की कहानी जो सुनी पानी से

सरफ़राज़ नवाज़

आँख ही आँख थी मंज़र भी नहीं था कोई

सरफ़राज़ ख़ालिद

लम्हा लम्हा तजरबा होने लगा

सरफ़राज़ दानिश

फ़िक्र ओ एहसास के तपते हुए मंज़र तक आ

सरदार सलीम

फ़िक्र ओ एहसास के तपते हुए मंज़र तक आ

सरदार सलीम

शायद मिट्टी मुझे फिर पुकारे

सारा शगुफ़्ता

आधा कमरा

सारा शगुफ़्ता

हर नफ़स इक मुस्तक़िल फ़रियाद है

साक़िब कानपुरी

मुहासबा

साक़ी फ़ारुक़ी

एक सुअर से

साक़ी फ़ारुक़ी

अलकुबड़े

साक़ी फ़ारुक़ी

यहीं कहीं पे कभी शोला-कार मैं भी था

साक़ी फ़ारुक़ी

सुर्ख़ चमन ज़ंजीर किए हैं सब्ज़ समुंदर लाया हूँ

साक़ी फ़ारुक़ी

रात अपने ख़्वाब की क़ीमत का अंदाज़ा हुआ

साक़ी फ़ारुक़ी

बाहर के असरार लहू के अंदर खुलते हैं

साक़ी फ़ारुक़ी

इज़्तिराब

सलमान अंसारी

ये अलग बात कि वो मुझ से ख़फ़ा रहता है

सलमान अख़्तर

मसअला हुस्न-ए-तख़य्युल का है न इल्हाम का है

सलमा शाहीन

हम झुकाते भी कहाँ सर को क़ज़ा से पहले

सलमा शाहीन

कनार-ए-आब तिरे पैरहन बदलने का

सालिम सलीम

नहीं है कोई दूसरा मंज़र चारों ओर

सलीम शहज़ाद

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