दृश्य Poetry (page 12)

कहाँ तक वक़्त के दरिया को हम ठहरा हुआ देखें

शहरयार

जहाँ पे तेरी कमी भी न हो सके महसूस

शहरयार

देख दरिया को कि तुग़्यानी में है

शहरयार

बदल जाएगा सब कुछ ये तमाशा भी नहीं होगा

शहराम सर्मदी

मुन्तज़िम

शहनाज़ नबी

हुआ सरकश अंधेरा सख़्त-जाँ है

शहनाज़ नबी

वो सामने हों मिरे और नज़र झुकी न रहे

शहनाज़ मुज़म्मिल

मिरी तरह से कहीं ख़ाक छानता होगा

शहनाज़ मुज़म्मिल

सूरज तिरी दहलीज़ में अटका हुआ निकला

शहनवाज़ ज़ैदी

मेज़ पे चेहरा ज़ुल्फ़ें काग़ज़ पर

शहनवाज़ ज़ैदी

उसे जब भी देखा बहुत ध्यान से

शाहिदा तबस्सुम

जिधर भी देखिए इक रास्ता बना हुआ है

शाहिद ज़की

सीने की मिसाल आग है चाँदी सा धुआँ है

शाहिद शैदाई

न जाने क्या हुए अतराफ़ देखने वाले

शाहिद मीर

वो क्यूँ आया

शाहिद मलिक

कश्ती रवाँ-दवाँ थी समुंदर खुला हुआ

शाहिद माहुली

कश्ती रवाँ-दवाँ थी समुंदर खुला हुआ

शाहिद माहुली

हर दर-ओ-दीवार पे लर्ज़ां कोई पैकर लगे

शाहिद माहुली

इक अज़ाब होता है रोज़ जी का खोना भी

शाहिद लतीफ़

सियाह सफ़्हा-ए-हस्ती पे मैं उभर न सका

शाहिद कलीम

लहू का दाग़ न था ज़ख़्म का निशान न था

शाहिद कलीम

क्या फ़र्ज़ है ये जिस्म के ज़िंदाँ में सज़ा दे

शाहिद कबीर

ज़िंदगी है मुख़्तसर आहिस्ता चल

शाहीन ग़ाज़ीपुरी

ज़मीं का आख़िरी मंज़र दिखाई देने लगा

शाहीन अब्बास

ख़ुद में उतरें तो पलट कर वापस आ सकते नहीं

शाहीन अब्बास

कैसा कैसा दर पस-ए-दीवार करना पड़ गया

शाहीन अब्बास

दर-ए-इम्काँ से गुज़र कर सर-ए-मंज़र आ कर

शाहीन अब्बास

ये ज़र्द फूल ये काग़ज़ पे हर्फ़ गीले से

शहबाज़ ख़्वाजा

सो गया ओढ़ के फिर शब की क़बाएँ सूरज

शहबाज़ ख़्वाजा

इक ऐसा वक़्त भी सहरा में आने वाला है

शहबाज़ ख़्वाजा

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