दृश्य Poetry (page 10)

मुक़ाबिल इक ज़माना और सफ़-आराई मेरी

शौकत मेहदी

कुतिया

शारिक़ कैफ़ी

बीच भँवर से लौट आऊँगा

शारिक़ कैफ़ी

ये कुछ बदलाव सा अच्छा लगा है

शारिक़ कैफ़ी

सामने तेरे हूँ घबराया हुआ

शारिक़ कैफ़ी

जो कहता है कि दरिया देख आया

शारिक़ कैफ़ी

ख़्वाब ऐसा भी नज़र आया है अक्सर मुझ को

शारिक़ जमाल

नग़्मगी से सुकूत बेहतर था

शरीफ़ मुनव्वर

अपनी रूदाद कहूँ या ग़म-ए-दुनिया लिक्खूँ

शरर फ़तेह पुरी

अपने पस-मंज़र में मंज़र बोलते

शरर फ़तेह पुरी

रात शहर और उस के बच्चे

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

पहुँचा मैं कू-ए-यार में जब सर लिए हुए

शमीम तारिक़

किसी से पूछें कौन बताए किस ने महशर देखा है

शमीम तारिक़

मिरे अतराफ़ ये कैसी सदाएँ रक़्स करती हैं

शमीम रविश

दीवार की सूरत था कभी दर की तरह था

शमीम रविश

सराबों का सफ़र

शमीम क़ासमी

सय्याल तसव्वुर है उबलने की तरह का

शमीम क़ासमी

जब सुब्ह का मंज़र होता है या चाँदनी-रातें होती हैं

शमीम जयपुरी

बंद कर के खिड़कियाँ यूँ रात को बाहर न देख

शमीम हनफ़ी

शाम के साहिल पे सूरज का सफ़ीना आ लगा

शमीम हनफ़ी

रोज़ ओ शब की गुत्थियाँ आँखों को सुलझाने न दे

शमीम हनफ़ी

परछाइयों की बात न कर रंग-ए-हाल देख

शमीम हनफ़ी

क्यूँ परेशान हुआ जाता है दिल क्या जाने

शमीम हनफ़ी

कई रातों से बस इक शोर सा कुछ सर में रहता है

शमीम हनफ़ी

कभी सहरा में रहते हैं कभी पानी में रहते हैं

शमीम हनफ़ी

एक बेनाम-ओ-निशाँ रूह का पैकर हूँ मैं

शमीम हनफ़ी

बंद कर ले खिड़कियाँ यूँ रात को बाहर न देख

शमीम हनफ़ी

बंद कर के खिड़कियाँ यूँ रात को बाहर न देख

शमीम हनफ़ी

डूबते सूरज का मंज़र वो सुहानी कश्तियाँ

शमीम फ़ारूक़ी

अँधेरी शब है कहाँ रूठ कर वो जाएगा

शमीम फ़ारूक़ी

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