दृश्य Poetry (page 9)

बयाबानों पे ज़िंदानों पे वीरानों पे क्या गुज़री

सिकंदर अली वज्द

तअ'ल्लुक़ की ना-जाएज़ तजावुज़ात

सिदरा सहर इमरान

ख़ुद-कुशी करने का अगला मंसूबा

सिदरा सहर इमरान

वो सर्द धूप रेत समुंदर कहाँ गया

सिदरा सहर इमरान

लकड़ी की दो मेज़ें हैं इक लोहे की अलमारी है

सिदरा सहर इमरान

एक बेचैन समुंदर है मिरे जिस्म में क़ैद

सिद्दीक़ मुजीबी

नैरंग-ए-जहाँ रंग-ए-तमाशा है तो क्या है

सिद्दीक़ मुजीबी

एक बे-मंज़र उदासी चार-सू आँखों में है

सिद्दीक़ मुजीबी

आग देखूँ कभी जलता हुआ बिस्तर देखूँ

सिद्दीक़ मुजीबी

अँधियारा

सिद्दीक़ कलीम

जब ध्यान में वो चाँद सा पैकर उतर गया

सिद्दीक़ अफ़ग़ानी

खुला न उस पे कभी मेरी आँख का मंज़र

सिद्दीक़ शाहिद

फ़ुग़ान-ए-रूह कोई किस तरह सुनाए उसे

सिद्दीक़ शाहिद

जैसा मंज़र मिले गवारा कर

शुजा ख़ावर

यहाँ तो क़ाफ़िले भर को अकेला छोड़ देते हैं

शुजा ख़ावर

समझते क्या हैं इन दो चार रंगों को उधर वाले

शुजा ख़ावर

जैसा मंज़र मिले गवारा कर

शुजा ख़ावर

बहता है कोई ग़म का समुंदर मिरे अंदर

शोज़ेब काशिर

रात का तारीक-तर पत्थर जिगर पानी करें

शोएब निज़ाम

किसी नादीदा शय की चाह में अक्सर बदलते हैं

शोएब निज़ाम

हवस के बीज बदन जब से दिल में बोने लगा

शोएब निज़ाम

ज़हर-ए-शब वीरान बिस्तर ऐ ख़ुदा

शहपर रसूल

हम ज़िंदगी-शनास थे सब से जुदा रहे

शहपर रसूल

कई शक्लों में ख़ुद को सोचता है

शीन काफ़ निज़ाम

ज़मीं का क़र्ज़

शाज़ तमकनत

छटा आदमी

शाज़ तमकनत

शिकोह-ए-ज़ात से दुश्मन का लश्कर काँप जाता है

शायान क़ुरैशी

सफ़र कहने को जारी है मगर अज़्म-ए-सफ़र ग़ाएब

शायान क़ुरैशी

रविश रविश पे चमन के बुझे बुझे मंज़र

शाैकत वास्ती

याद

शौकत परदेसी

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