दृश्य Poetry (page 29)

वो शख़्स कभी जिस ने मिरा घर नहीं देखा

दिलावर फ़िगार

यूँ दीदा-ए-ख़ूँ-बार के मंज़र से उठा मैं

दिलावर अली आज़र

मैं सुर्ख़ फूल को छू कर पलटने वाला था

दिलावर अली आज़र

ख़ुद में खिलते हुए मंज़र से नुमूदार हुआ

दिलावर अली आज़र

हवा ने इस्म कुछ ऐसा पढ़ा था

दिलावर अली आज़र

दूर के एक नज़ारे से निकल कर आई

दिलावर अली आज़र

अक्स मंज़र में पलटने के लिए होता है

दिलावर अली आज़र

अजीब रंग अजब हाल में पड़े हुए हैं

दिलावर अली आज़र

आग लग जाएगी इक दिन मिरी सरशारी को

दिलावर अली आज़र

उदासी के मंज़र मकानों में हैं

देवमणि पांडेय

कुछ यूँ सफ़र के शौक़ ने मंज़र दिखाए हैं

देवमणि पांडेय

पर्दा-दार हस्ती थी ज़ात के समुंदर में

दत्तात्रिया कैफ़ी

क़ैद-ए-ग़म-ए-हयात से अहल-ए-जहाँ मफ़र नहीं

दर्शन सिंह

नई नई सूरतें बदन पर उजालता हूँ

दानियाल तरीर

सितम के बा'द भी बाक़ी करम की आस तो है

दानिश फ़राही

वाइज़ तू अगर उन के कूचे से गुज़र जाए

दानिश अलीगढ़ी

चेहरे पे नूर-ए-सुब्ह सियह गेसुओं में रात

दाएम ग़व्वासी

मोहब्बत की गली से हम जहाँ हो कर निकल आए

चित्रांश खरे

सभी सम्तों को ठुकरा कर उड़ी जाए

चंद्र प्रकाश शाद

कभी हवा ने कभी उड़ते पत्थरों ने किया

चंद्र प्रकाश शाद

हर इक इम्कान तक पस्पाई है अपनी

चंद्र प्रकाश शाद

बदन को अपनी बिसात तक तो पसारना था

चंद्र प्रकाश शाद

आसिफ़ुद्दौला का इमामबाड़ा लखनऊ

चकबस्त ब्रिज नारायण

मेरे ख़ामोश ख़ुदा

बुशरा एजाज़

मंज़रों के दरमियाँ मंज़र बनाना चाहिए

बुशरा एजाज़

कितना अजीब शब का ये मंज़र लगा मुझे

बिस्मिल आग़ाई

मिरी हथेली में लिक्खा हुआ दिखाई दे

बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन

अपनी तो कोई बात बनाए नहीं बनी

बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन

रंग ले कर नया उदासी का

बिल्क़ीस ख़ान

लगा के नक़्ब किसी रोज़ मार सकते हैं

बिल्क़ीस ख़ान

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