मिल Poetry (page 28)

बारूद के बदले हाथों में आ जाए किताब तो अच्छा हो

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

नक़्श-बर-आब नाम है सैल-ए-फ़ना मक़ाम

ग़ुलाम मौला क़लक़

ख़ुशी में भी नवा-संज-ए-फ़ुग़ाँ हूँ

ग़ुलाम मौला क़लक़

ऐ सितम-आज़मा जफ़ा कब तक

ग़ुलाम मौला क़लक़

ये सच है मिल बैठने की हद तक तो काम आई है ख़ुश-गुमानी

ग़ुलाम हुसैन साजिद

समझते हैं जो अपने बाप की जागीर मिट्टी को

ग़ुलाम हुसैन साजिद

कहीं मोहब्बत के आसमाँ पर विसाल का चाँद ढल रहा है

ग़ुलाम हुसैन साजिद

अगर ये रंगीनी-ए-जहाँ का वजूद है अक्स-ए-आसमाँ से

ग़ुलाम हुसैन साजिद

न सुब्ह वुसअ'त न शाम वुसअ'त

ग़ुफ़रान अमजद

उस लब से मिल ही जाएगा बोसा कभी तो हाँ

ग़ालिब

सितम-कश मस्लहत से हूँ कि ख़ूबाँ तुझ पे आशिक़ हैं

ग़ालिब

सादगी पर उस की मर जाने की हसरत दिल में है

ग़ालिब

हुस्न-ए-मह गरचे ब-हंगाम-ए-कमाल अच्छा है

ग़ालिब

है वस्ल हिज्र आलम-ए-तमकीन-ओ-ज़ब्त में

ग़ालिब

दर्द से मेरे है तुझ को बे-क़रारी हाए हाए

ग़ालिब

नदी

गीताञ्जलि राय

दूसरा कप

गीताञ्जलि राय

जाती रुत से प्यार करोगे

गौहर होशियारपुरी

उधार

फ़ुर्क़त काकोरवी

कहाँ का वस्ल तन्हाई ने शायद भेस बदला है

फ़िराक़ गोरखपुरी

बद-गुमाँ हो के मिल ऐ दोस्त जो मिलना है तुझे

फ़िराक़ गोरखपुरी

ये नर्म नर्म हवा झिलमिला रहे हैं चराग़

फ़िराक़ गोरखपुरी

तुम्हें क्यूँकर बताएँ ज़िंदगी को क्या समझते हैं

फ़िराक़ गोरखपुरी

जिसे लोग कहते हैं तीरगी वही शब हिजाब-ए-सहर भी है

फ़िराक़ गोरखपुरी

'फ़िराक़' इक नई सूरत निकल तो सकती है

फ़िराक़ गोरखपुरी

चमन अपने रंग में मस्त है कोई ग़म-गुसार-ए-दिगर नहीं

फ़िगार उन्नावी

आ के हो जा बे-लिबास

फ़ज़्ल ताबिश

ज़िंदगानी को अदम-आबाद ले जाने लगा

फ़ाज़िल जमीली

सुख़न जो उस ने कहे थे गिरह से बाँध लिए

फ़ाज़िल जमीली

तोहफ़ा-ए-ग़म भी मिला दर्द की सौग़ात के बा'द

फ़ाज़िल अंसारी

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