मिल Poetry (page 36)

वाँ इरादा आज उस क़ातिल के दिल में और है

ज़फ़र

टुकड़े नहीं हैं आँसुओं में दिल के चार पाँच

ज़फ़र

मोहब्बत चाहिए बाहम हमें भी हो तुम्हें भी हो

ज़फ़र

इतना न अपने जामे से बाहर निकल के चल

ज़फ़र

ज़ेहन और दिल में जो रहती है चुभन खुल जाए

बद्र वास्ती

चराग़ों में अँधेरा है अँधेरे में उजाले हैं

बद्र वास्ती

गुम-शुदा मौसम का आँखों में कोई सपना सा था

बदनाम नज़र

हार-सिंगार

अज़रा नक़वी

तुम हँसते क्यूँ हो

अज़रा अब्बास

टुकड़ों में बटी हुई ज़िंदगी

अज़रा अब्बास

एक ज़िंदगी और मिल जाए

अज़रा अब्बास

प्यारा प्यारा घर अपना

अज़मतुल्लाह ख़ाँ

गरचे कुछ रंग उस का काला है

अज़मतुल्लाह ख़ाँ

कहीं गोयाई के हाथों समाअत रो रही है

अज़्म बहज़ाद

बे-हद ग़म हैं जिन में अव्वल उम्र गुज़र जाने का ग़म

अज़्म बहज़ाद

जहाँ में हम जिसे भी प्यार के क़ाबिल समझते हैं

अज़ीज़ वारसी

तसमा-ए-पा

अज़ीज़ तमन्नाई

सफ़र मुदाम सफ़र

अज़ीज़ तमन्नाई

यूँही कटे न रहगुज़र-ए-मुख़्तसर कहीं

अज़ीज़ तमन्नाई

आख़िरी दिन से पहले

अज़ीज़ क़ैसी

आईने से

अज़ीज़ क़ैसी

दिल-ख़स्तगाँ में दर्द का आज़र कोई तो आए

अज़ीज़ क़ैसी

ख़ाक चेहरे पे मल रहा हूँ मैं

अज़ीज़ नबील

बिखेरता है क़यास मुझ को

अज़ीज़ नबील

चश्म-ए-साक़ी का तसव्वुर बज़्म में काम आ गया

अज़ीज़ लखनवी

ज़ंजीर-ए-पा से आहन-ए-शमशीर है तलब

अज़ीज़ हामिद मदनी

मिरी आँखें गवाह-ए-तल'अत-ए-आतिश हुईं जल कर

अज़ीज़ हामिद मदनी

आज कम-अज़-कम ख़्वाबों ही में मिल के पी लेते हैं, कल

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

मेरा भी हर अंग था बहरा उस का जिस्म भी गूँगा था

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

'शफ़क़' का रंग कितने वालेहाना-पन से बिखरा है

अज़ीज अहमद ख़ाँ शफ़क़

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