मिल Poetry (page 34)
वो देखते जाते हैं कनखियों से इधर भी
बेख़ुद देहलवी
हिजाब दूर तुम्हारा शबाब कर देगा
बेख़ुद देहलवी
दे मोहब्बत तो मोहब्बत में असर पैदा कर
बेख़ुद देहलवी
बेवफ़ा कहने से क्या वो बेवफ़ा हो जाएगा
बेख़ुद देहलवी
और साक़ी पिला अभी क्या है
बेख़ुद देहलवी
ख़ून हो जाएँ ख़ाक में मिल जाएँ
बेखुद बदायुनी
हासिल उस मह-लक़ा की दीद नहीं
बेखुद बदायुनी
फ़र्श ता अर्श कोई नाम-ओ-निशाँ मिल न सका
बेकल उत्साही
यूँ तो कहने को तिरी राह का पत्थर निकला
बेकल उत्साही
ख़ुशी महसूस करता हूँ न ग़म महसूस करता हूँ
बहज़ाद लखनवी
ख़ुदा को ढूँड रहा था कहीं ख़ुदा न मिला
बहज़ाद लखनवी
चश्म-ए-हसीं में है न रुख़-ए-फ़ित्ना-गर में है
बहज़ाद लखनवी
रहने दे रतजगों में परेशाँ मज़ीद उसे
बेदिल हैदरी
दरिया ने कल जो चुप का लिबादा पहन लिया
बेदिल हैदरी
तुम ख़फ़ा हो तो अच्छा ख़फ़ा हो
बेदम शाह वारसी
सहारा मौजों का ले ले के बढ़ रहा हूँ मैं
बेदम शाह वारसी
क्या गिला इस का जो मेरा दिल गया
बेदम शाह वारसी
बताए देती है बे-पूछे राज़ सब दिल के
बेदम शाह वारसी
अगर काबा का रुख़ भी जानिब-ए-मय-ख़ाना हो जाए
बेदम शाह वारसी
मिस्ल-ए-हुबाब-ए-बहर न इतना उछल के चल
बयान मेरठी
ग़म्ज़ा-ए-मा'शूक़ मुश्ताक़ों को दिखलाती है तेग़
बयान मेरठी
बढ़ गई तुझ से मिल के तन्हाई
बासिर सुल्तान काज़मी
दिल में हर-चंद आरज़ू थी बहुत
बासिर सुल्तान काज़मी
पूछते हैं वो इश्क़ का मतलब
बशीरुद्दीन अहमद देहलवी
जब मिलेंगे कि अब मिलेंगे आप
बशीरुद्दीन अहमद देहलवी
ये एक पेड़ है आ इस से मिल के रो लें हम
बशीर बद्र
अगर तलाश करूँ कोई मिल ही जाएगा
बशीर बद्र
उदास आँखों से आँसू नहीं निकलते हैं
बशीर बद्र
सोए कहाँ थे आँखों ने तकिए भिगोए थे
बशीर बद्र
सोचा नहीं अच्छा बुरा देखा सुना कुछ भी नहीं
बशीर बद्र
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