मिल Poetry (page 33)
मिन्नतों से भी न वो हूर-शमाइल आया
दाग़ देहलवी
दिल चुरा कर नज़र चुराई है
दाग़ देहलवी
क़रार खो के चले बे-क़रार हो के चले
चरख़ चिन्योटी
क़रार खो के चले बे-क़रार हो के चले
चरख़ चिन्योटी
जब सर-ए-बाम वो ख़ुर्शीद-जमाल आता है
चरख़ चिन्योटी
हम जो मिल बैठें तो यक-जान भी हो सकते हैं
चरख़ चिन्योटी
हम जो मिल बैठें तो यक जान भी हो सकते हैं
चरख़ चिन्योटी
गुम-शुदा आदमी का इंतिज़ार
चन्द्रभान ख़याल
कैसा वो मौसम था ये तो समझ न पाए हम
चंद्र प्रकाश शाद
मौत आएगी उस से मिल लेंगे
चमन लाल चमन
हम से यूँ बे-रुख़ी से मिलते हैं
चमन लाल चमन
उन्हें ये फ़िक्र है हर दम नई तर्ज़-ए-जफ़ा क्या है
चकबस्त ब्रिज नारायण
जो न कट सका वो निशान था किसी ज़ख़्म का
बुशरा हाश्मी
सर-ए-दश्त दिल जो सराब था कोई ख़्वाब था
बुशरा हाश्मी
पास होने का इशारा मिल गया
बबल्स होरा सबा
ख़ामुशी में क़यास मेरा है
बबल्स होरा सबा
इस क़दर बढ़ गई वहशत तिरे दीवाने की
बूम मेरठी
हैराँ हूँ कि अब लाऊँ कहाँ से मैं ज़बाँ और
बिस्मिल साबरी
इक ग़लत सज्दे से क्या होता है वाइज़ कुछ न पूछ
बिस्मिल अज़ीमाबादी
जब कभी नाम-ए-मोहम्मद लब पे मेरे आए है
बिस्मिल अज़ीमाबादी
आरज़ूएँ नज़्र-ए-दौराँ नज़्र-ए-जानाँ हो गईं
बिर्ज लाल रअना
इतना अच्छा न अगर होता तो हम सा होता
बिमल कृष्ण अश्क
ग़ाफ़िल इतना हुस्न पे ग़र्रा ध्यान किधर है तौबा कर
भारतेंदु हरिश्चंद्र
बाल बिखेरे आज परी तुर्बत पर मेरे आएगी
भारतेंदु हरिश्चंद्र
किसी भी सम्त निकलूँ मेरा पीछा रोज़ होता है
भारत भूषण पन्त
कब तलक चलना है यूँ ही हम-सफ़र से बात कर
भारत भूषण पन्त
कब तक गर्दिश में रहना है कुछ तो बता अय्याम मुझे
भारत भूषण पन्त
जुस्तुजू मेरी कहीं थी और मैं भटका कहीं
भारत भूषण पन्त
दश्त में उड़ते बगूलों की ये मस्ती एक दिन
भारत भूषण पन्त
इस जबीन-ए-अरक़-अफ़्शाँ पे न चुनिए अफ़्शाँ
बेख़ुद देहलवी
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