मिल Poetry (page 37)

ज़ौक़-ए-अमल के सामने दूरी सिमट गई

अज़ीज अहमद ख़ाँ शफ़क़

हर इक फ़नकार ने जो कुछ भी लिक्खा ख़ूब-तर लिक्खा

अज़ीज अहमद ख़ाँ शफ़क़

तू भी वफ़ा के रूप में अब ढल के देख ले

अज़हर जावेद

इस बार उन से मिल के जुदा हम जो हो गए

अज़हर इनायती

दियों से आग जो लगती रही मकानों को

अज़हर इनायती

आज़ुर्दा निगाहों पे ये मंज़र नहीं उतरा

अज़हर हाश्मी

वही यकसानियत-ए-शाम-ओ-सहर है कि जो थी

अज़ीम मुर्तज़ा

ग़म का ये सलीक़ा भी रह गया है अब हम तक

अज़ीम मुर्तज़ा

ज़िंदगी ऐ ज़िंदगी!! आ दो घड़ी मिल कर रहें

आज़ाद गुलाटी

वक़्त का ये मोड़ कैसा है कि तुझ से मिल के भी

आज़ाद गुलाटी

तेरे क़दमों की आहट को तरसा हूँ

आज़ाद गुलाटी

रौशनी फैली तो सब का रंग काला हो गया

आज़ाद गुलाटी

मेरा तो नाम रेत के सागर पे नक़्श है

आज़ाद गुलाटी

किस ने सदा दी कौन आया है

आज़ाद गुलाटी

ख़ुद हमीं को राहतों के कैफ़ का चसका न था

आज़ाद गुलाटी

हर इक शिकस्त को ऐ काश इस तरह मैं सहूँ

आज़ाद गुलाटी

हम को न मिल सका तो फ़क़त इक सुकून-ए-दिल

आज़ाद अंसारी

इक तुम कि हो बे-ख़बर सदा के

अय्यूब ख़ावर

उस निगाह-ए-नाज़ ने यूँ रात-भर तज्सीम की

औरंगज़ेब

वो दौर क़रीब आ रहा है

अतहर नफ़ीस

वो दौर क़रीब आ रहा है

अतहर नफ़ीस

मिस्ल-ए-बाद-ए-सबा तेरे कूचे में ऐ जान-ए-जाँ आए हैं

अतहर नफ़ीस

आसमाँ गर्दिश में था सारी ज़मीं चक्कर में थी

अतीक़ मुज़फ़्फ़रपुरी

फूल पर ओस है आरिज़ पे नमी हो जैसे

अतीक़ अंज़र

न मिल सका तरी लहरों में भी क़रार मुझे

अतीक़ अंज़र

शजर से मिल के जो रोने लगा था

अतीक़ अहमद

तिरी आँखों में इक मुबहम फ़साना ढूँढ ही लेगा

अताउर्रहमान जमील

मेहनत से मिल गया जो दफ़ीने के बीच था

अता तुराब

नूरा

असरार-उल-हक़ मजाज़

नज़्र-ए-दिल

असरार-उल-हक़ मजाज़

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