मिल Poetry (page 39)

साग़र नहीं कि झूम के उट्ठे उठा लिया

असग़र मेहदी होश

बहाना मिल न जाए बिजलियों को टूट पड़ने का

असर लखनवी

रवाँ है क़ाफ़िला-ए-जुस्तुजू किधर मेरा

असद जाफ़री

कुछ तो मिल जाए लब-ए-शीरीं से

आरज़ू लखनवी

क़ुर्बत बढ़ा बढ़ा कर बे-ख़ुद बना रहे हैं

आरज़ू लखनवी

क्यूँ किसी रह-रौ से पूछूँ अपनी मंज़िल का पता

आरज़ू लखनवी

नशीली छाँव में बीते हुए ज़मानों को

अर्शी भोपाली

फ़लसफ़ी किस लिए इल्ज़ाम-ए-फ़ना देता है

अर्शी भोपाली

दर्द के साँचे में ढल कर रह गई

अर्शी भोपाली

कोई नहीं है इंतिज़ार सुब्ह-ए-विसाल के सिवा

अरशद लतीफ़

कुछ तो मिल जाए कहीं दीदा-ए-पुर-नम के सिवा

अरशद कमाल

हर एक लम्हा-ए-ग़म बहर-ए-बे-कराँ की तरह

अरशद कमाल

लूटे मज़े जो हम ने तुम्हारे उगाल के

अरशद अली ख़ान क़लक़

15 अगस्त (1949)

अर्श मलसियानी

बदली हुई दुनिया की नज़र देख रहे हैं

अर्जुमंद बानो अफ़्शाँ

ये दिन

आरिफ़ा शहज़ाद

देख लो गे ख़ुद!

आरिफ़ा शहज़ाद

गिला तिरे फ़िराक़ का जो आज-कल नहीं रहा

आरिफ़ इशतियाक़

सुकून-ए-दिल न मयस्सर हुआ ज़माने में

अनवापुल हसन अनवार

आया न आब-ए-रफ़्ता कभी जूएबार में

अनवापुल हसन अनवार

कहाँ मुमकिन है पोशीदा ग़म-ए-दिल का असर होना

अनवरी जहाँ बेगम हिजाब

आना भी आने वाले का अफ़्साना हो गया

अनवरी जहाँ बेगम हिजाब

ज़हर की चुटकी ही मिल जाए बराए दर्द-ए-दिल

अनवर शऊर

ये ख़ुद को देखते रहने की है जो ख़ू मुझ में

अनवर शऊर

जल्वे दिखाए यार ने अपनी हरीम-ए-नाज़ में

अनवर सहारनपुरी

तू भी कर ग़ौर इस कहानी पर

अनवर सदीद

साँसों में मिल गई तिरी साँसों की बास थी

अनवर सदीद

हर सम्त समुंदर है हर सम्त रवाँ पानी

अनवर सदीद

कुछ अबरुओं पे बल भी हैं ख़ंदा-लबी के साथ

अनवर साबरी

कहीं और ही चलना होगा

अनवर नदीम

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