मिल Poetry (page 45)

तुम गले मिल कर जो कहते हो कि अब हद से न बढ़

अहमद हुसैन माइल

ज़मज़मा नाला-ए-बुलबुल ठहरे

अहमद हुसैन माइल

समझ के हूर बड़े नाज़ से लगाई चोट

अहमद हुसैन माइल

क़िबला-ए-आब-ओ-गिल तुम्हीं तो हो

अहमद हुसैन माइल

प्यार अपने पे जो आता है तो क्या करते हैं

अहमद हुसैन माइल

तज्दीद-3

अहमद हमेश

लैंडस्केप

अहमद हमेश

ख़ाक-ए-बिसात

अहमद हमेश

इस से ज़ियादा कुछ नहीं

अहमद हमेश

धुँद के रिश्ते है

अहमद हमेश

1973 की एक नज़्म

अहमद हमेश

कभी तुम ने कुछ तो दिया नहीं कभी हम ने कुछ तो लिया नहीं

अहमद हमेश

तुझ से मिल कर तो ये लगता है कि ऐ अजनबी दोस्त

अहमद फ़राज़

तू सामने है तो फिर क्यूँ यक़ीं नहीं आता

अहमद फ़राज़

किसी को घर से निकलते ही मिल गई मंज़िल

अहमद फ़राज़

तुझ से मिल कर तो ये लगता है कि ऐ अजनबी दोस्त

अहमद फ़राज़

फिर उसी रहगुज़ार पर शायद

अहमद फ़राज़

क्यूँ न हम अहद-ए-रिफ़ाक़त को भुलाने लग जाएँ

अहमद फ़राज़

जब यार ने रख़्त-ए-सफ़र बाँधा कब ज़ब्त का पारा उस दिन था

अहमद फ़राज़

जब हर इक शहर बलाओं का ठिकाना बन जाए

अहमद फ़राज़

फ़क़ीह-ए-शहर की मज्लिस से कुछ भला न हुआ

अहमद फ़राज़

अभी कुछ और करिश्मे ग़ज़ल के देखते हैं

अहमद फ़राज़

अब किसी ख़्वाब की ताबीर नहीं चाहता मैं

अहमद अशफ़ाक़

इब्न-ए-आदम बरसर पैकार है

अहमद अली बर्क़ी आज़मी

न निकला मुँह से कुछ निकली न कुछ भी क़ल्ब-ए-मुज़्तर की

आग़ा शाएर क़ज़लबाश

मस्कन वहीं कहीं है वहीं आशियाँ कहीं

आग़ा शाएर क़ज़लबाश

लाख लाख एहसान जिस ने दर्द पैदा कर दिया

आग़ा शाएर क़ज़लबाश

गिरी गिर कर उठी पलटी तो जो कुछ था उठा लाई

आग़ा शाएर क़ज़लबाश

बहार आई है फिर चमन में नसीम इठला के चल रही है

आग़ा शाएर क़ज़लबाश

तिरी गली में जो धूनी रमाए बैठे हैं

आग़ा हज्जू शरफ़

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